श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 10

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 36 मिनट का पठन 148 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः | अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ||१०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
सहयज्ञाः
यज्ञ के साथ
प्रजाः
प्रजाओं को
सृष्ट्वा
सृष्टि करके
पुरा
पूर्व काल में
उवाच
बोला
प्रजापतिः
प्रजापति (ब्रह्मा)
अनेन
इस (यज्ञ) से
प्रसविष्यध्वम्
बढ़ो-फूलो
एष
यह
व
तुम्हारे लिए
अस्तु
हो
इष्टकामधुक्
इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

प्रजापति (ब्रह्मा) ने युगों के आदि में यज्ञ के साथ प्रजाओं को उत्पन्न करके कहा – इस (यज्ञ) से तुम लोग समृद्ध होओ और यह (यज्ञ) तुम्हारी समस्त इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह ग्रंथ न केवल जीवन जीने की कला सिखाता है, बल्कि इस ब्रह्मांड के सुचारू संचालन के मूल रहस्यों को भी उजागर करता है। गीता के तीसरे अध्याय (कर्मयोग) का दसवां श्लोक—"सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः | अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ||१०||"—समस्त ब्रह्मांडीय व्यवस्था, कर्तव्यपरायणता और मनुष्य के नैतिक व आध्यात्मिक उत्तरदायित्वों का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक अंक में हम वेदों और पुराणों के परिप्रेक्ष्य में इस दिव्य श्लोक की गहराई में उतरेंगे। यह श्लोक हमें बताता है कि किस प्रकार परमपिता ब्रह्मा ने सृष्टि के आदिकाल में मनुष्यों और यज्ञों की रचना एक साथ की थी। यहाँ 'यज्ञ' शब्द का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना मात्र नहीं है, बल्कि यह परोपकार, समर्पण, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और सामूहिक कल्याण की एक समग्र जीवनशैली का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने दैनिक जीवन में यज्ञ की इस भावना को आत्मसात करता है, तो वह न केवल अपनी भौतिक और आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति करता है, बल्कि समूची प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि सृष्टि के साथ हमारा संबंध अधिकार का नहीं, बल्कि आदान-प्रदान और कृतज्ञता का है। जैसे-जैसे हम इस गूढ़ श्लोक के विभिन्न आयामों का अन्वेषण करेंगे, हमारे सामने वेदों का वह सनातन सत्य प्रकट होगा जो आधुनिक युग की अशांति, तनाव और पर्यावरण संकट का भी सटीक समाधान प्रस्तुत करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

इस पावन श्लोक का पाठ करने से पूर्व मन को शांत करें, पवित्र आसन पर बैठें और भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों का ध्यान करते हुए इसका सस्वर उच्चारण करें। वैदिक छंदों के नियमों के अनुसार इसका पाठ मानसिक एकाग्रता को बढ़ाता है:

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ १०॥

(इति श्रीमद्भगवद्गीतायां तृतीयोऽध्यायः कर्मयोगः — श्लोक १०)

श्लोक पाठ की विधि एवं नियम:
  • प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • अपने पूजा स्थल पर दीप प्रज्वलित करें और भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का स्मरण करें।
  • इस श्लोक का कम से कम 11 या 21 बार प्रतिदिन सस्वर पाठ करें।
  • पाठ के पश्चात अपने कर्तव्यों (कर्म) को यज्ञ की भावना से करने का संकल्प लें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों का गांभीर्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सह-यज्ञाः यज्ञ सहित सृष्टि की उत्पत्ति के समय ही यज्ञ की भावना (त्याग और समर्पण) को मानव स्वभाव के साथ अंतर्निहित किया गया।
प्रजाः प्रजा / मनुष्य समुदाय ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न समस्त जीव और विशेषकर मनुष्य समाज, जो कर्म करने और मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी है।
सृष्ट्वा रचकर / उत्पन्न करके परमपिता ब्रह्मा द्वारा इस विविधतापूर्ण संसार और जीवों की रचना का दिव्य संकल्प।
पुरा आदिकाल में / पहले सृष्टि के आरंभिक काल में, जब मानवीय सभ्यता का सूत्रपात हुआ था, तब की सनातन व्यवस्था।
उवाच कहा / आदेश दिया प्रजापति ब्रह्मा द्वारा मानव जाति के कल्याण हेतु दी गई वेदमय और कल्याणकारी आचार संहिता।
प्रजापतिः प्रजा के स्वामी ब्रह्मा समस्त जीवों के रचयिता और पालक आदि-पिता ब्रह्मा, जो संपूर्ण जीवों के संरक्षक हैं।
अनेन इसके द्वारा (यज्ञ से) यज्ञीय कर्मों, परस्पर सहयोग और निस्वार्थ भाव से किए गए कर्मों के माध्यम से।
प्रसविष्यध्वम् वृद्धिमंद करो / उन्नति करो भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से उत्तरोत्तर प्रगति और समृद्धि प्राप्त करो।
एषः यह (यज्ञ) वह विशिष्ट कर्म और जीवनशैली जो समस्त सुखों का मूल आधार है।
वः तुम्हारा समस्त मानव जाति के लिए भगवान का यह सीधा और स्पष्ट संदेश।
अस्तु हो यह आदेश तुम्हारे लिए आशीर्वाद और मार्गदर्शक बने।
इष्ट-कामधुक् इच्छित फल देने वाली कामधेनु समस्त मनोकामनाओं, भौतिक सुखों और आध्यात्मिक शांति को प्रदान करने वाली दिव्य शक्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

सनातन धर्म के ग्रंथों—विशेषकर वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों में सृष्टि की उत्पत्ति की अनेक कथाएं मिलती हैं। जब प्रजापति ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की, तो उनके मन में यह विचार आया कि यह संसार केवल उपभोग की वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक विशाल यज्ञशाला है। पुराणों के अनुसार, आदिकाल में जब प्रजापति ने मनुष्यों को उत्पन्न किया, तो उन्होंने देखा कि मनुष्य केवल अपनी क्षुधा और स्वार्थ पूर्ति में प्रवृत्त हो सकते हैं, जिससे ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ सकता है। इस आसुरी प्रवृत्ति और असंतुलन को रोकने के लिए ही उन्होंने 'यज्ञ' के विधान की स्थापना की।

वैदिक परंपरा में यज्ञ का तात्पर्य केवल अग्नि में घी और हवन सामग्री डालना नहीं है। छांदोग्य उपनिषद और शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ को जीवन का सार बताया गया है। मनुष्य का शरीर स्वयं एक यज्ञ कुंड है, जिसमें श्वास-प्रश्वास की आहुतियां दी जा रही हैं। जब प्रजापति ने मनुष्यों से कहा कि "इस यज्ञ के द्वारा तुम उन्नति करो और यह तुम्हारे लिए कामधेनु बने," तो इसका गूढ़ार्थ यह था कि प्रकृति और मनुष्य के बीच एक अनुबंध (Covenant) है। प्रकृति हमें जल, वायु, अन्न और ऊर्जा देती है, और बदले में मनुष्य का कर्तव्य है कि वह कृतज्ञता, वृक्षारोपण, जीवों की सेवा, और नैतिक कर्मों (यज्ञ) के माध्यम से प्रकृति का संवर्धन करे।

महाभारत और श्रीमद्भागवत महापुराण में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि बिना यज्ञ और दान के मनुष्य का जीवन भारस्वरूप है। त्रेता युग और द्वापर युग में राजाओं और ऋषियों ने इसी यज्ञीय संस्कृति को जीवित रखकर अपनी प्रजा को समृद्ध किया था। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं कि कर्मों से मुंह मोड़कर सन्यास ले लेना समाधान नहीं है, बल्कि अपने निर्धारित कर्तव्यों को यज्ञ की भावना से करना ही वास्तविक मोक्ष का मार्ग है। यह ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि हमें यह सिखाती है कि हमारी हर सांस और हर गतिविधि समष्टि (Universe) के साथ जुड़ी हुई है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस दसवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेक प्रकार के मानसिक, आध्यात्मिक और कार्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

श्लोक के नियमित जप से मन का भटकाव कम होता है और एकाग्रता शक्ति में तीव्र वृद्धि होती है। दैनिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

वैदिक मंत्रों के उच्चारण से शरीर और आसपास के वातावरण में उच्च कंपन (High Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जो नकारात्मकता को दूर भगाते हैं।

3. कार्मिक शुद्धि (Karma Purification)

जब मनुष्य अपने कर्मों को 'यज्ञ' की भावना से (बिना स्वार्थ के) करता है, तो उसके संचित पापों और बुरे कर्मों के बंधनों का क्षय होने लगता है।

4. कर्तव्यबोध और उत्तरदायित्व

यह श्लोक व्यक्ति को उसके परिवार, समाज और प्रकृति के प्रति उसके कर्तव्यों का बोध कराता है, जिससे समाज में सद्भाव बढ़ता है।

5. भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि

इसे 'इष्टकामधुक्' (कामधेनु) कहा गया है। इसके प्रभाव से साधक की भौतिक आवश्यकताएं स्वतः पूर्ण होती हैं और आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है।

6. प्रकृति के साथ सामंजस्य

पर्यावरण संरक्षण और生态 संतुलन के प्रति आध्यात्मिक चेतना जाग्रत होती है, जिससे साधक प्रकृति का विध्वंसक नहीं बल्कि रक्षक बनता है।

7. अहंकार का शमन

यह समझ विकसित होती है कि हम सब प्रकृति और ईश्वर की व्यवस्था के अंग हैं, जिससे अहंकार का नाश होता है और विनम्रता आती है।

8. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के वचनों का पालन करने से साधक को उनकी अहैतुकी कृपा और भगवद्प्राप्ति का मार्ग सुलभ होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न टीकाग्रंथों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और ज्ञानेश्वरी) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि सनातन धर्म के इन पावन ग्रंथों का मूल संदेश आधुनिक पाठकों तक उनकी संपूर्ण शुद्धता और प्रामाणिकता के साथ पहुचे। किसी भी प्रकार के भ्रम से बचने के लिए मूल संस्कृत श्लोकों के साथ-साथ उनके दार्शनिक और व्यावहारिक पक्षों को भी जोड़ा गया है ताकि आज की पीढ़ी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

वैदिक दर्शन में यज्ञ का दायरा बहुत व्यापक है। यद्यपि अग्नि में आहुति देना इसका एक बाह्य रूप (कर्मकांड) है, किंतु दार्शनिक स्तर पर अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से निर्वाह करना, समाज की भलाई के लिए त्याग करना, भूखों को भोजन कराना, और प्रकृति का संरक्षण करना भी यज्ञ ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कई प्रकार के यज्ञों (जैसे ज्ञान यज्ञ, जप यज्ञ, प्राण यज्ञ आदि) का वर्णन किया है।

'इष्टकामधुक्' का शाब्दिक अर्थ है—इच्छित फलों को देने वाली कामधेनु गाय। श्लोक के अनुसार, जब मनुष्य यज्ञ (कर्तव्यनिष्ठा और परोपकार) के मार्ग पर चलता है, तो प्रकृति और ब्रह्मांडीय शक्तियां स्वतः उसकी सभी उचित और सात्विक आवश्यकताओं (भौतिक और आध्यात्मिक) को पूर्ण करती हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि देने की भावना से ही सब कुछ प्राप्त होता है।

तीसरा अध्याय 'कर्मयोग' कहलाता है। इसमें अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो आप मुझे भयानक युद्ध जैसे कर्म में क्यों लगा रहे हैं? इसके उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। सृष्टि के संचालन के लिए कर्म अनिवार्य है, और उसी प्रसंग में प्रजापति ब्रह्मा और यज्ञ की इस कथा के माध्यम से कर्म की महत्ता समझाई गई है।

दैनिक जीवन में इस श्लोक का अभ्यास करने के लिए हमें अपने प्रत्येक कार्य को समर्पण और ईमानदारी से करना चाहिए। अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियों को बोझ न मानकर एक यज्ञ समझकर निभाना चाहिए। इसके साथ ही, जल, ऊर्जा और पर्यावरण का दुरुपयोग न करना तथा प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रहना ही इस श्लोक का व्यावहारिक जीवन में पालन है।

जी नहीं, श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों के पाठ के लिए किसी विशेष दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है। कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति पवित्रता और निष्ठा के साथ इनका सस्वर पाठ कर सकता है और इनके अर्थ को अपने जीवन में उतारकर मानसिक व आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning

ब्रह्मा ने यज्ञ के साथ मनुष्यों को बनाया और कहा कि यज्ञ से समृद्ध होओ। Brahmā created humans with sacrifice and told them to prosper through it.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/43 23% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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