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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 11

अध्याय 3 · श्लोक 11

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः | परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ||११||

devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ | parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ param avāpsyatha ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

देवान्: देवताओं को; भावयत: प्रसन्न करो; अनेन: इस (यज्ञ) से; ते: वे; देवा: देवता; भावयन्तु: प्रसन्न करें; व: तुम्हें; परस्परम्: परस्पर; भावयन्त: प्रसन्न करते हुए; श्रेय: कल्याण; परम्: परम; अवाप्स्यथ: प्राप्त करोगे।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस यज्ञ के द्वारा तुम देवताओं को प्रसन्न करो और वे देवता तुम्हें प्रसन्न करें। इस प्रकार परस्पर प्रसन्न करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे।

English Translation

By this (yajña) please the gods, and let the gods please you. Thus pleasing one another, you shall attain the supreme good.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यज्ञ का एक और आयाम – देवता और मनुष्य का पारस्परिक सहयोग। देवताओं को यज्ञ से प्रसन्न करके उनसे वर्षा आदि प्राप्त करना, जिससे संसार चलता है। यह एक सहकारी चक्र है। Another dimension of yajña – mutual cooperation between gods and humans. Pleasing the gods through sacrifice brings rains etc., which sustain the world. It is a cycle of mutual nourishment.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।