कर्म योग (Karma Yoga) – श्लोक 11

श्लोक ११ में बताया गया है कि यज्ञ से देवताओं को प्रसन्न करो और वे तुम्हें प्रसन्न करें। Verse 11: Please the gods through sacrifice, and let them please you.

संस्कृत श्लोक

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः | परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ||११||

devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ | parasparaṃ bhāvayantaḥ śreyaḥ param avāpsyatha ||11||

पदच्छेद / शब्दार्थ

देवान्: देवताओं को; भावयत: प्रसन्न करो; अनेन: इस (यज्ञ) से; ते: वे; देवा: देवता; भावयन्तु: प्रसन्न करें; व: तुम्हें; परस्परम्: परस्पर; भावयन्त: प्रसन्न करते हुए; श्रेय: कल्याण; परम्: परम; अवाप्स्यथ: प्राप्त करोगे।

हिंदी अनुवाद

इस यज्ञ के द्वारा तुम देवताओं को प्रसन्न करो और वे देवता तुम्हें प्रसन्न करें। इस प्रकार परस्पर प्रसन्न करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त होगे।

English Translation

By this (yajña) please the gods, and let the gods please you. Thus pleasing one another, you shall attain the supreme good.

टीका / Commentary

यज्ञ का एक और आयाम – देवता और मनुष्य का पारस्परिक सहयोग। देवताओं को यज्ञ से प्रसन्न करके उनसे वर्षा आदि प्राप्त करना, जिससे संसार चलता है। यह एक सहकारी चक्र है। Another dimension of yajña – mutual cooperation between gods and humans. Pleasing the gods through sacrifice brings rains etc., which sustain the world. It is a cycle of mutual nourishment.