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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 12

अध्याय 3 · श्लोक 12

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः | तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ||१२||

iṣṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ | tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

इष्टान्: वांछित; भोगान्: भोगों को; हि: निश्चय ही; व: तुम्हें; देवा: देवता; दास्यन्ते: देंगे; यज्ञभाविता: यज्ञ द्वारा प्रसन्न किए हुए; तै: उनके द्वारा; दत्तान्: दिए हुए; अप्रदाय: न देकर; एभ्य: उनको (देवताओं को); य: जो; भुङ्क्ते: भोगता है; स्तेन: चोर; एव: ही; स: वह।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता तुम्हें वांछित भोग देंगे। जो उनके द्वारा दिए हुए भोगों को उन्हें (देवताओं को) अर्पित किए बिना ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।

English Translation

Pleased by sacrifice, the gods will grant you the enjoyments you desire. One who enjoys their gifts without offering them (in return) is certainly a thief.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ भगवान एक नैतिक सिद्धान्त बताते हैं – जो कुछ भी हमें देवताओं (प्रकृति, समाज) से मिलता है, उसका कुछ अंश लौटाना हमारा कर्तव्य है। ऐसा न करना चोरी के समान है। Here the Lord gives a moral principle: whatever we receive from the gods (nature, society), it is our duty to return a part. Not doing so is equivalent to theft.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।