श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 12

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 33 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः | तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ||१२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
इष्टान्
वांछित
भोगान्
भोगों को
हि
निश्चय ही
व
तुम्हें
देवा
देवता
दास्यन्ते
देंगे
यज्ञभाविता
यज्ञ द्वारा प्रसन्न किए हुए
तै
उनके द्वारा
दत्तान्
दिए हुए
अप्रदाय
न देकर
एभ्य
उनको (देवताओं को)
य
जो
भुङ्क्ते
भोगता है
स्तेन
चोर
एव
ही
स
वह।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता तुम्हें वांछित भोग देंगे। जो उनके द्वारा दिए हुए भोगों को उन्हें (देवताओं को) अर्पित किए बिना ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का यह बारहवाँ श्लोक मानव जीवन के सबसे बड़े नैतिक, सामाजिक, पारिस्थितिक और आध्यात्मिक सत्य को उद्घाटित करता है। यह श्लोक केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह समूचे ब्रह्मांड के संतुलन, प्रकृति के चक्र और मनुष्य के सामाजिक उत्तरदायित्व का एक अनुपम दस्तावेज है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह समझा रहे हैं कि इस सृष्टि में कुछ भी एकाकी या स्वतंत्र नहीं है। हम जो कुछ भी उपभोग करते हैं—चाहे वह प्राणवायु हो, जल हो, अन्न हो, या समाज से मिलने वाली सुरक्षा और ज्ञान हो—वह सब हमें समष्टि (प्रकृति और देवताओं) द्वारा प्रदान किया गया है। जब हम इस विराट व्यवस्था से निरंतर ग्रहण करते हैं, तो हमारा यह परम कर्तव्य बन जाता है कि हम भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार यज्ञ (परोपकार, सेवा, दान, और कर्तव्य-पालन) के माध्यम से इस सृष्टि को वापस लौटाएं। यदि कोई मनुष्य केवल उपभोग करता है और बदले में कुछ भी योगदान नहीं देता, तो वह इस ब्रह्मांडीय चक्र में एक गंभीर बाधा उत्पन्न करता है। श्रीकृष्ण ऐसे व्यक्ति को 'स्तेन' अर्थात् चोर की संज्ञा देते हैं। यह श्लोक हमें कृतज्ञता (Gratitude) का पाठ पढ़ाता है। कृतज्ञता ही वह सेतु है जो मनुष्य को संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाती है। इस श्लोक का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है, क्योंकि यह हमें स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है और यह स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व इस ब्रह्मांड के साथ एक अटूट सूत्र में बंधा हुआ है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता - तृतीय अध्याय ॥

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥ १२ ॥

iṣṭān bhōgān hi vō dēvā dāsyantē yajña-bhāvitāḥ ।
tair dattān apradāyaibhyō yō bhuṅktē stēna ēva saḥ ॥ 12 ॥

पठन एवं साधना विधि:

इस परम कल्याणकारी श्लोक का सस्वर पाठ करने की एक विशिष्ट और वैज्ञानिक विधि है। साधक को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। शांत चित्त से भगवान श्रीकृष्ण के पार्थसारथी रूप का ध्यान करते हुए इस श्लोक का कम से कम 11, 21 या 108 बार जप करना चाहिए। जप करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यह जप न केवल हमारी वाणी को शुद्ध करता है, बल्कि हमारे अंतःकरण में कृतज्ञता और सेवा की भावना का संचार करता है। इस श्लोक के नियमित श्रवण और मनन से मनुष्य के भीतर संचय की प्रवृत्ति (Hoarding) कम होती है और त्याग की भावना सुदृढ़ होती है। साधना के अंत में भगवान को अपनी सभी इंद्रियों और कर्मों को समर्पित करने का संकल्प लेना चाहिए, जिससे कर्म बंधन से मुक्ति मिलती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन दार्शनिक रहस्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से प्रत्येक पद के शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ को विस्तार से समझा जा सकता है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इष्टान् (iṣṭān) इच्छित / मनचाहे / आवश्यक हमारे जीवन यापन, शारीरिक पोषण और मानसिक विकास के लिए जो भी अनुकूल और आवश्यक सामग्रियां हैं।
भोगान् (bhōgān) उपभोग की सामग्रियों को अन्न, जल, वायु, प्रकाश और समाज से मिलने वाले भौतिक व अभौतिक साधन जिनका हम दैनिक जीवन में उपभोग करते हैं।
हि (hi) निश्चित ही / निःसंदेह यह शब्द इस ब्रह्मांडीय नियम की अटल सत्यता और अनिवार्यता को रेखांकित करता है। इसमें कोई संशय नहीं है।
वः (vō) तुमको / तुम्हारे लिए भगवान श्रीकृष्ण यहाँ संपूर्ण मानव जाति को संबोधित कर रहे हैं, जो कर्म क्षेत्र में रत है।
देवाः (dēvāḥ) देवतागण / प्रकृति की शक्तियां वेदों में वर्णित प्राकृतिक शक्तियां (जैसे सूर्य, वरुण, अग्नि, पवन) जो जीवन को बनाए रखने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।
दास्यन्ते (dāsyantē) प्रदान करेंगे / देंगे प्रकृति और ईश्वर की व्यवस्था के तहत हमें स्वतः ही जीवनोपयोगी वस्तुएं प्राप्त होती रहती हैं।
यज्ञभाविताः (yajña-bhāvitāḥ) यज्ञ द्वारा पुष्ट या प्रसन्न किए गए जब मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन निःस्वार्थ भाव से करता है, तो प्रकृति की शक्तियां संतुलित और पुष्ट होती हैं।
तैः (taiḥ) उनके द्वारा उन देवताओं या प्रकृति की शक्तियों के द्वारा जो इस सृष्टि का संचालन करती हैं।
दत्तान् (dattān) दिए गए उपहारों को जो कुछ भी हमें जीवन में बिना किसी व्यक्तिगत प्रयास के जन्मजात मिला है, जैसे श्वास लेने के लिए हवा और पीने के लिए पानी।
अप्रदाय (apradāya) बिना दिए / बिना अर्पित किए बिना किसी सेवा, दान, परोपकार या कृतज्ञता के भाव के, केवल अपने स्वार्थ के लिए रख लेना।
एभ्यः (ēbhyaḥ) इनको / देवताओं को प्रकृति, समाज, माता-पिता, गुरुओं और समस्त जीव-जंतुओं को जो हमारे जीवन के आधार हैं।
यः (yaḥ) जो कोई भी मनुष्य वह व्यक्ति जो इस सृष्टि के सह-अस्तित्व के नियम को अनदेखा करता है।
भुङ्क्ते (bhuṅktē) उपभोग करता है जो केवल अपनी इंद्रियों की तृप्ति और भौतिक सुखों के संचय में लगा रहता है।
स्तेनः (stēnaḥ) चोर वह व्यक्ति जो दूसरों के हिस्से का अधिकार छीनता है और ब्रह्मांडीय संतुलन को बिगाड़ता है।
एव सः (ēva saḥ) वह वास्तव में ही है श्रीकृष्ण अत्यंत कड़े शब्दों में घोषणा करते हैं कि ऐसा स्वार्थी व्यक्ति निश्चित रूप से चोर ही है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्धक्षेत्र से जुड़ी है, जहाँ अर्जुन अपने ही सगे-संबंधियों के विरुद्ध युद्ध करने की ग्लानि और मोह से ग्रस्त होकर अपने धनुष को त्याग देते हैं। अर्जुन को कर्म से विमुख होते देख भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्मयोग का उपदेश देते हैं। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कर्म से भागना मुक्ति का मार्ग नहीं है, बल्कि निष्काम भाव से अपने नियत कर्तव्यों का पालन करना ही वास्तविक संन्यास है।

वैदिक काल से ही 'यज्ञ' की अवधारणा भारतीय संस्कृति के केंद्र में रही है। वेदों में 'पुरुष सूक्त' के अंतर्गत ब्रह्मांड की उत्पत्ति को भी एक विराट यज्ञ के रूप में वर्णित किया गया है, जहाँ आदिपुरुष ने स्वयं की आहुति देकर इस सृष्टि का सृजन किया। इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण 'पंचमहायज्ञ' की शास्त्रीय परंपरा को रेखांकित कर रहे हैं। सनातन धर्म में प्रत्येक गृहस्थ के लिए पांच महायज्ञों का विधान है:

  • देवयज्ञ: अग्निहोत्र और प्रकृति की शक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना।
  • पितृयज्ञ: अपने पूर्वजों, माता-पिता और वंश परंपरा के प्रति आदर व तर्पण।
  • ऋषियज्ञ (ब्रह्मयज्ञ): वेदों, शास्त्रों का अध्ययन करना और ज्ञान का प्रसार करना।
  • मनुष्ययज्ञ: अतिथि सत्कार, भूखों को भोजन और समाज के वंचित वर्गों की सेवा करना।
  • भूतयज्ञ: पशु-पक्षियों, चींटियों, गायों और वृक्षों को अन्न-जल देना।

एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब महाराज रंतिदेव के राज्य में भीषण अकाल पड़ा, तब उन्होंने स्वयं भूखे रहकर भी अपने पास बचे अंतिम अन्न और जल को एक भूखे अतिथि, एक कुत्ते और एक चांडाल को अर्पित कर दिया। उन्होंने कहा कि जो अन्न मुझे प्रकृति से मिला है, उस पर पहला अधिकार भूखे जीवों का है। यह कथा इस श्लोक के व्यावहारिक रूप को दर्शाती है। यदि हम केवल अपने लिए संचय करते हैं, तो हम प्रकृति के ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकते। श्रीकृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति समाज और प्रकृति से सब कुछ लेता है, लेकिन अपने कर्तव्यों (यज्ञ) के माध्यम से उन्हें कुछ वापस नहीं लौटाता, वह इस ब्रह्मांडीय चक्र का उल्लंघन करता है और आध्यात्मिक रूप से पतित हो जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित पाठ और इसके अर्थ का मनन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:

1. कृतज्ञता की भावना का उदय

मनुष्य के भीतर कृतज्ञता (Gratitude) का भाव जाग्रत होता है, जो मानसिक शांति और संतोष के लिए सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है।

2. स्वार्थ और लोभ का शमन

यह श्लोक हमारे भीतर छिपे अत्यधिक लोभ, संचय की प्रवृत्ति और स्वार्थ की भावना को नष्ट कर परोपकार की ओर प्रवृत्त करता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और दिव्य आभा मंडल

जब हम इस श्लोक के अर्थ को आत्मसात करते हैं, तो हमारे विचारों में शुद्धि आती है, जिससे हमारे चारों ओर एक सकारात्मक आभा मंडल (Aura) का निर्माण होता है।

4. संचित कर्मों की शुद्धि

निष्काम कर्म और सेवा की भावना से किए गए कार्य हमारे पूर्व जन्मों के संचित पापों का क्षय करते हैं और वर्तमान कर्मों को निष्पाप बनाते हैं।

5. पारिस्थितिक चेतना (Ecological Awareness)

यह श्लोक हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है, जिससे हम पर्यावरण की रक्षा, जल संरक्षण और वृक्षारोपण के लिए स्वतः प्रेरित होते हैं।

6. मानसिक तनाव और चिंता से मुक्ति

जब मनुष्य यह समझ जाता है कि सब कुछ ईश्वर का है और उसे केवल अपना कर्तव्य करना है, तो उसका मानसिक तनाव और भविष्य की चिंता समाप्त हो जाती है।

7. ईश्वरीय कृपा और समृद्धि की प्राप्ति

यज्ञीय जीवन (दूसरों की सेवा करने वाले) जीने वाले व्यक्ति पर भगवान श्रीकृष्ण और समस्त दैवीय शक्तियों की विशेष कृपा बनी रहती है, जिससे जीवन में कभी अभाव नहीं रहता।

8. सामाजिक समरसता और यश

यह श्लोक समाज में परस्पर सहयोग और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है। ऐसा परोपकारी व्यक्ति समाज में अत्यंत आदर और यश प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों जैसे आदि शंकराचार्य के 'शांकरभाष्य', रामानुजाचार्य के 'गीताभाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों जैसे स्वामी विवेकानंद व स्वामी चिन्मयानंद के विचारों के गहन तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है। इस विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य पाठकों को गीता के व्यावहारिक, वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्षों से अवगत कराना है। यहाँ प्रस्तुत विचार किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते, बल्कि वैज्ञानिक और नैतिक दृष्टिकोण से जीवन जीने की कला सिखाते हैं। सनातन धर्म के अनुसार, प्रकृति और मनुष्य का संबंध 'परस्परं भावयन्तः' (एक-दूसरे को पुष्ट करने) का है। इस सामग्री की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्थानत्रयी के सिद्धांतों का अक्षरशः पालन किया गया है।

श्लोक का अर्थ / Meaning

देवताओं द्वारा दिए भोगों को बिना उन्हें अर्पित किए भोगना चोरी है। Enjoying the gifts of the gods without offering to them is theft.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 12 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 12/43 28% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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