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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 13

अध्याय 3 · श्लोक 13

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||१३||

yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ | bhuñjate te tv aghaṃ pāpā ye pacanty ātmakāraṇāt ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यज्ञशिष्ट: यज्ञ से बचे हुए अन्न को; अशिन: खाने वाले; सन्त: सज्जन; मुच्यन्ते: मुक्त हो जाते हैं; सर्वकिल्बिषै: सब पापों से; भुञ्जते: भोगते हैं; ते: वे; तु: तो; अघम्: पाप को; पापा: पापी; ये: जो; पचन्ति: पकाते हैं; आत्मकारणात्: अपने लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले सज्जन सब पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिए (बिना यज्ञ किए) भोजन पकाते हैं, वे तो पाप ही खाते हैं।

English Translation

The virtuous who eat the remnants of sacrifice are freed from all sins. But those who cook food only for themselves (without sharing) verily eat sin.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक सामूहिक जीवन और साझा करने के महत्व पर जोर देता है। जो केवल अपने लिए कमाता और खाता है, वह पाप का भागी होता है। सच्चा सुखी वह है जो बाँटकर खाता है। This verse emphasises the importance of sharing and communal life. One who earns and eats only for oneself partakes of sin. True happiness lies in sharing.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।