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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 · श्लोक 7

अध्याय 3 · श्लोक 7

कर्म योग (Karma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन | कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ||७||

yas tv indriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna | karmendriyaiḥ karmayogam asaktaḥ sa viśiṣyate ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

य: जो; तु: लेकिन; इन्द्रियाणि: इन्द्रियों को; मनसा: मन द्वारा; नियम्य: नियंत्रित करके; आरभते: आरम्भ करता है; अर्जुन: हे अर्जुन; कर्मेन्द्रियै: कर्मेन्द्रियों द्वारा; कर्मयोगम्: कर्मयोग को; असक्तः: आसक्ति रहित; स: वह; विशिष्यते: श्रेष्ठ है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु हे अर्जुन! जो मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।

English Translation

But he who controls the senses by the mind, O Arjuna, and engages the organs of action in karma-yoga without attachment – he is superior.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अब भगवान श्रेष्ठ साधक का लक्षण बताते हैं – जो मन से इन्द्रियों को नियंत्रित करता है और फिर भी कर्म करता है, लेकिन आसक्ति रहित होकर। यही कर्मयोगी है। Now the Lord describes the ideal practitioner: one who controls the senses with the mind, yet performs action without attachment. This is the true karma yogi.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।