कर्म योग (Karma Yoga) – श्लोक 7

श्लोक ७ में बताया गया है कि मन से इन्द्रियों को वश में करके आसक्ति रहित कर्म करने वाला श्रेष्ठ है। Verse 7: He who controls the senses with the mind and performs karma yoga without attachment is superior.

संस्कृत श्लोक

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन | कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ||७||

yas tv indriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna | karmendriyaiḥ karmayogam asaktaḥ sa viśiṣyate ||7||

पदच्छेद / शब्दार्थ

य: जो; तु: लेकिन; इन्द्रियाणि: इन्द्रियों को; मनसा: मन द्वारा; नियम्य: नियंत्रित करके; आरभते: आरम्भ करता है; अर्जुन: हे अर्जुन; कर्मेन्द्रियै: कर्मेन्द्रियों द्वारा; कर्मयोगम्: कर्मयोग को; असक्तः: आसक्ति रहित; स: वह; विशिष्यते: श्रेष्ठ है।

हिंदी अनुवाद

परन्तु हे अर्जुन! जो मन द्वारा इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति रहित होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।

English Translation

But he who controls the senses by the mind, O Arjuna, and engages the organs of action in karma-yoga without attachment – he is superior.

टीका / Commentary

अब भगवान श्रेष्ठ साधक का लक्षण बताते हैं – जो मन से इन्द्रियों को नियंत्रित करता है और फिर भी कर्म करता है, लेकिन आसक्ति रहित होकर। यही कर्मयोगी है। Now the Lord describes the ideal practitioner: one who controls the senses with the mind, yet performs action without attachment. This is the true karma yogi.