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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 8

अध्याय 2 · श्लोक 8

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||८||

na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yac chokam ucchoṣaṇam indriyāṇām | avāpya bhūmāv asapatnam ṛddhaṃ rājyaṃ surāṇām api cādhipatyam ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; हि: निश्चय ही; प्रपश्यामि: देखता हूँ; मम: मेरे; अपनुद्यात्: दूर कर सके; यत्: जो; शोकम्: शोक को; उच्छोषणम्: सुखा देने वाला; इन्द्रियाणाम्: इन्द्रियों को; अवाप्य: प्राप्त करके; भूमौ: पृथ्वी पर; असपत्नम्: बिना शत्रु के; ऋद्धम्: समृद्ध; राज्यम्: राज्य; सुराणाम्: देवताओं का; अपि: भी; च: और; आधिपत्यम्: अधिपत्य।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके, चाहे मैं पृथ्वी पर बिना शत्रु के समृद्ध राज्य प्राप्त कर लूँ या देवताओं का भी अधिपति बन जाऊँ।

English Translation

I do not see anything that can drive away this grief which dries up my senses, even if I attain unrivalled prosperous dominion on earth or even lordship over the gods.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन कहते हैं कि उनका शोक इतना प्रबल है कि कोई भी भौतिक उपलब्धि उसे दूर नहीं कर सकती। यह उनकी गहरी निराशा और मोह की पराकाष्ठा है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।