सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 8

श्लोक ८ में अर्जुन कहते हैं कि सांसारिक उपलब्धियाँ उनके शोक को नहीं मिटा सकतीं।

संस्कृत श्लोक

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||८||

na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yac chokam ucchoṣaṇam indriyāṇām | avāpya bhūmāv asapatnam ṛddhaṃ rājyaṃ surāṇām api cādhipatyam ||8||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; हि: निश्चय ही; प्रपश्यामि: देखता हूँ; मम: मेरे; अपनुद्यात्: दूर कर सके; यत्: जो; शोकम्: शोक को; उच्छोषणम्: सुखा देने वाला; इन्द्रियाणाम्: इन्द्रियों को; अवाप्य: प्राप्त करके; भूमौ: पृथ्वी पर; असपत्नम्: बिना शत्रु के; ऋद्धम्: समृद्ध; राज्यम्: राज्य; सुराणाम्: देवताओं का; अपि: भी; च: और; आधिपत्यम्: अधिपत्य।

हिंदी अनुवाद

मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता जो मेरी इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक को दूर कर सके, चाहे मैं पृथ्वी पर बिना शत्रु के समृद्ध राज्य प्राप्त कर लूँ या देवताओं का भी अधिपति बन जाऊँ।

English Translation

I do not see anything that can drive away this grief which dries up my senses, even if I attain unrivalled prosperous dominion on earth or even lordship over the gods.

टीका / Commentary

अर्जुन कहते हैं कि उनका शोक इतना प्रबल है कि कोई भी भौतिक उपलब्धि उसे दूर नहीं कर सकती। यह उनकी गहरी निराशा और मोह की पराकाष्ठा है।