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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 7

अध्याय 2 · श्लोक 7

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः | यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||७||

kārpaṇya-doṣopahata-svabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharma-sammūḍha-cetāḥ | yac chreyaḥ syān niścitaṃ brūhi tan me śiṣyas te 'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कार्पण्यदोष: कृपणता के दोष से; उपहत: ग्रस्त; स्वभावः: स्वभाव वाला; पृच्छामि: पूछता हूँ; त्वाम्: आपसे; धर्मसम्मूढचेताः: धर्म के विषय में मूढ़ चित्त वाला; यत्: जो; श्रेयः: कल्याणकारी; स्यात्: हो; निश्चितम्: निश्चित रूप से; ब्रूहि: कहो; तत्: वह; मे: मुझे; शिष्यः: शिष्य; ते: आपका; अहम्: मैं हूँ; शाधि: सिखाइए; माम्: मुझे; त्वाम्: आपको; प्रपन्नम्: शरणागत।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मेरा स्वभाव कृपणता के दोष से ग्रसित हो गया है और धर्म के विषय में मूढ़ बुद्धि होकर मैं आपसे पूछता हूँ। जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह मुझसे कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपको शरणागत हूँ, मुझे सिखाइए।

English Translation

My very nature is afflicted with the weakness of (sentimental) pity. With my mind bewildered about my duty, I ask You: tell me, for certain, what is good for me. I am Your disciple; teach me, who have taken refuge in You.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन अब पूरी तरह समर्पण कर देते हैं। वे कहते हैं कि उनका स्वभाव दोषग्रस्त हो गया है, वे धर्म के बारे में भ्रमित हैं। इसलिए वे कृष्ण से निश्चित कल्याणकारी मार्ग बताने का अनुरोध करते हैं, स्वयं को शिष्य और शरणागत घोषित करते हैं। यह गीता के उपदेश का आधार बनता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।