सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 7

श्लोक ७ में अर्जुन कृष्ण को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करते हुए निश्चित कल्याण का मार्ग बताने की प्रार्थना करते हैं।

संस्कृत श्लोक

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः | यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||७||

kārpaṇya-doṣopahata-svabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṃ dharma-sammūḍha-cetāḥ | yac chreyaḥ syān niścitaṃ brūhi tan me śiṣyas te 'haṃ śādhi māṃ tvāṃ prapannam ||7||

पदच्छेद / शब्दार्थ

कार्पण्यदोष: कृपणता के दोष से; उपहत: ग्रस्त; स्वभावः: स्वभाव वाला; पृच्छामि: पूछता हूँ; त्वाम्: आपसे; धर्मसम्मूढचेताः: धर्म के विषय में मूढ़ चित्त वाला; यत्: जो; श्रेयः: कल्याणकारी; स्यात्: हो; निश्चितम्: निश्चित रूप से; ब्रूहि: कहो; तत्: वह; मे: मुझे; शिष्यः: शिष्य; ते: आपका; अहम्: मैं हूँ; शाधि: सिखाइए; माम्: मुझे; त्वाम्: आपको; प्रपन्नम्: शरणागत।

हिंदी अनुवाद

मेरा स्वभाव कृपणता के दोष से ग्रसित हो गया है और धर्म के विषय में मूढ़ बुद्धि होकर मैं आपसे पूछता हूँ। जो निश्चित कल्याणकारी हो, वह मुझसे कहिए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपको शरणागत हूँ, मुझे सिखाइए।

English Translation

My very nature is afflicted with the weakness of (sentimental) pity. With my mind bewildered about my duty, I ask You: tell me, for certain, what is good for me. I am Your disciple; teach me, who have taken refuge in You.

टीका / Commentary

अर्जुन अब पूरी तरह समर्पण कर देते हैं। वे कहते हैं कि उनका स्वभाव दोषग्रस्त हो गया है, वे धर्म के बारे में भ्रमित हैं। इसलिए वे कृष्ण से निश्चित कल्याणकारी मार्ग बताने का अनुरोध करते हैं, स्वयं को शिष्य और शरणागत घोषित करते हैं। यह गीता के उपदेश का आधार बनता है।