सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 6

श्लोक ६ में अर्जुन स्वीकार करते हैं कि वे नहीं जानते कि युद्ध में जीतना बेहतर है या हारना, क्योंकि दोनों ही स्थितियों में अपनों का विनाश होगा।

संस्कृत श्लोक

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः | यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ||६||

na caitad vidmaḥ kataran no garīyo yad vā jayema yadi vā no jayeyuḥ | yān eva hatvā na jijīviṣāmas te 'vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ ||6||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; च: और; एतत्: यह; विद्मः: हम जानते हैं; कतरत्: कौन सा; नः: हमारे लिए; गरीयः: श्रेयस्कर; यत्: कि; वा: या; जयेम: हम जीतें; यदि: यदि; वा: या; न: हमें; जयेयुः: वे जीतें; यान्: जिनको; एव: निश्चय ही; हत्वा: मारकर; न: नहीं; जिजीविषामः: हम जीना चाहते; ते: वे; अवस्थिताः: खड़े हैं; प्रमुखे: सामने; धार्तराष्ट्राः: धृतराष्ट्र के पुत्र।

हिंदी अनुवाद

और हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या श्रेयस्कर है – कि हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन धृतराष्ट्र-पुत्रों को मारकर हम जीना नहीं चाहते, वे ही आज हमारे सामने खड़े हैं।

English Translation

Nor do we know which is better – whether we conquer them or they conquer us. The sons of Dhritarashtra, after killing whom we do not wish to live, are standing before us.

टीका / Commentary

अर्जुन की अनिश्चय की स्थिति और गहरी हो जाती है। वे कहते हैं कि युद्ध का परिणाम चाहे जो भी हो, यदि हमें अपनों को ही मारना पड़े तो विजय भी अर्थहीन है। यह मोह की चरम सीमा है।