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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 5

अध्याय 2 · श्लोक 5

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||५||

gurūn ahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyam apīha loke | hatvārtha-kāmāṃs tu gurūn ihaiva bhuñjīya bhogān rudhira-pradigdhān ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

गुरून्: गुरुजनों को; अहत्वा: न मारकर; हि: निश्चय ही; महानुभावान्: महानुभाव; श्रेयः: अच्छा; भोक्तुम्: भोगना; भैक्ष्यम्: भिक्षा; अपि: भी; इह: इस; लोके: लोक में; हत्वा: मारकर; अर्थकामान्: अर्थ और काम की इच्छा वाले; तु: तो; गुरून्: गुरुजनों को; इह: इसी; एव: ही; भुञ्जीय: भोगूँ; भोगान्: भोगों को; रुधिरप्रदिग्धान्: रुधिर से सने हुए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस लोक में ऐसे महानुभाव गुरुजनों को मारकर उनके दिए हुए (रुधिर से सने) भोगों को भोगने की अपेक्षा उन्हें न मारकर भिक्षा (माँगकर) खाना भी श्रेयस्कर है।

English Translation

It is better to live in this world by begging than to slay these noble gurus. If I kill them, even though they desire worldly gain, all the enjoyments I might obtain would be tainted with blood.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन अब एक नैतिक तर्क देते हैं – गुरुजनों की हत्या से प्राप्त सुख भी रक्त से सने होंगे, इसलिए उन्हें न मारना ही बेहतर है। यह अर्जुन की उदात्त भावना को दर्शाता है, किन्तु यह कर्तव्य-विमुखता का ही एक रूप है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।