सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 5

श्लोक ५ में अर्जुन कहते हैं कि गुरुजनों को मारने से प्राप्त भोगों की अपेक्षा भिक्षा माँगना भी अच्छा है।

संस्कृत श्लोक

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||५||

gurūn ahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṃ bhaikṣyam apīha loke | hatvārtha-kāmāṃs tu gurūn ihaiva bhuñjīya bhogān rudhira-pradigdhān ||5||

पदच्छेद / शब्दार्थ

गुरून्: गुरुजनों को; अहत्वा: न मारकर; हि: निश्चय ही; महानुभावान्: महानुभाव; श्रेयः: अच्छा; भोक्तुम्: भोगना; भैक्ष्यम्: भिक्षा; अपि: भी; इह: इस; लोके: लोक में; हत्वा: मारकर; अर्थकामान्: अर्थ और काम की इच्छा वाले; तु: तो; गुरून्: गुरुजनों को; इह: इसी; एव: ही; भुञ्जीय: भोगूँ; भोगान्: भोगों को; रुधिरप्रदिग्धान्: रुधिर से सने हुए।

हिंदी अनुवाद

इस लोक में ऐसे महानुभाव गुरुजनों को मारकर उनके दिए हुए (रुधिर से सने) भोगों को भोगने की अपेक्षा उन्हें न मारकर भिक्षा (माँगकर) खाना भी श्रेयस्कर है।

English Translation

It is better to live in this world by begging than to slay these noble gurus. If I kill them, even though they desire worldly gain, all the enjoyments I might obtain would be tainted with blood.

टीका / Commentary

अर्जुन अब एक नैतिक तर्क देते हैं – गुरुजनों की हत्या से प्राप्त सुख भी रक्त से सने होंगे, इसलिए उन्हें न मारना ही बेहतर है। यह अर्जुन की उदात्त भावना को दर्शाता है, किन्तु यह कर्तव्य-विमुखता का ही एक रूप है।