सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 51
श्लोक ५१ में फल त्याग के महत्व को बताते हुए कहा गया है कि इससे जन्म-बन्धन से मुक्ति मिलती है।
संस्कृत श्लोक
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः | जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ||५१||
karma-jaṃ buddhi-yuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ | janma-bandha-vinirmuktāḥ padaṃ gacchanty anāmayam ||51||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कर्मजम्: कर्मों से उत्पन्न; बुद्धियुक्ताः: समबुद्धि से युक्त; हि: निश्चय ही; फलम्: फल को; त्यक्त्वा: त्यागकर; मनीषिणः: बुद्धिमान; जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः: जन्म-बन्धन से मुक्त; पदम्: पद (गति) को; गच्छन्ति: जाते हैं; अनामयम्: रोगरहित (निर्विकार)।
हिंदी अनुवाद
समबुद्धि से युक्त बुद्धिमान पुरुष कर्मजन्य फल को त्यागकर जन्म-बन्धन से मुक्त होकर उस रोगरहित (निर्विकार) पद को प्राप्त होते हैं।
English Translation
The wise, endowed with equanimity, renounce the fruits of their actions and, freed from the bondage of birth, attain the state which is beyond all evil.
टीका / Commentary
निष्काम कर्म करने वाले जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त होकर परमपद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।