सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 50
श्लोक ५० में योग की प्रसिद्ध परिभाषा दी गई है – योगः कर्मसु कौशलम्।
संस्कृत श्लोक
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||५०||
buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛta-duṣkṛte | tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||50||
पदच्छेद / शब्दार्थ
बुद्धियुक्तः: समबुद्धि से युक्त; जहाति: त्याग देता है; इह: इस लोक में; उभे: दोनों; सुकृतदुष्कृते: पुण्य और पाप; तस्मात्: इसलिए; योगाय: योग के लिए; युज्यस्व: तत्पर हो; योगः: योग; कर्मसु: कर्मों में; कौशलम्: कुशलता (चातुर्य)।
हिंदी अनुवाद
समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तू योग के लिए तत्पर हो। योग कर्मों में कुशलता (चातुर्य) है।
English Translation
Endowed with equanimity, one frees oneself in this life from both good and evil deeds. Therefore, devote yourself to yoga. Yoga is skill in action.
टीका / Commentary
समबुद्धि वाला व्यक्ति पुण्य-पाप के बन्धन से मुक्त हो जाता है। योग कर्म करने की कुशलता है – अर्थात निपुणता से, फलासक्ति रहित होकर कर्म करना।