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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 50

अध्याय 2 · श्लोक 50

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||५०||

buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛta-duṣkṛte | tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||50||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

बुद्धियुक्तः: समबुद्धि से युक्त; जहाति: त्याग देता है; इह: इस लोक में; उभे: दोनों; सुकृतदुष्कृते: पुण्य और पाप; तस्मात्: इसलिए; योगाय: योग के लिए; युज्यस्व: तत्पर हो; योगः: योग; कर्मसु: कर्मों में; कौशलम्: कुशलता (चातुर्य)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए तू योग के लिए तत्पर हो। योग कर्मों में कुशलता (चातुर्य) है।

English Translation

Endowed with equanimity, one frees oneself in this life from both good and evil deeds. Therefore, devote yourself to yoga. Yoga is skill in action.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

समबुद्धि वाला व्यक्ति पुण्य-पाप के बन्धन से मुक्त हो जाता है। योग कर्म करने की कुशलता है – अर्थात निपुणता से, फलासक्ति रहित होकर कर्म करना।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।