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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 49

अध्याय 2 · श्लोक 49

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय | बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ||४९||

dūreṇa hy avaraṃ karma buddhi-yogād dhanañjaya | buddhau śaraṇam anviccha kṛpaṇāḥ phala-hetavaḥ ||49||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दूरेण: बहुत दूर से; हि: निश्चय ही; अवरम्: नीच; कर्म: कर्म; बुद्धियोगात्: बुद्धियोग (समबुद्धि) से; धनञ्जय: हे धनञ्जय; बुद्धौ: बुद्धि में; शरणम्: शरण; अन्विच्छ: खोज; कृपणाः: कृपण (दीन); फलहेतवः: फल के हेतु (इच्छा) वाले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे धनञ्जय! बुद्धियोग (समबुद्धि) से कर्म करना साधारण कर्म से बहुत श्रेष्ठ है। इसलिए तू बुद्धि में शरण चाह। फल की इच्छा रखने वाले तो कृपण (दीन) हैं।

English Translation

O Dhananjaya, action performed with the intellect of equanimity is far superior to mere action (for its fruits). Seek refuge in this intellect. Wretched are those who work for results.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

बुद्धियोग अर्थात समबुद्धि से किया गया कर्म श्रेष्ठ है। फल की इच्छा रखने वाले कृपण कहलाते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।