सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 49
श्लोक ४९ में बुद्धियोग (समबुद्धि) को साधारण कर्म से श्रेष्ठ बताया गया है।
संस्कृत श्लोक
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय | बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ||४९||
dūreṇa hy avaraṃ karma buddhi-yogād dhanañjaya | buddhau śaraṇam anviccha kṛpaṇāḥ phala-hetavaḥ ||49||
पदच्छेद / शब्दार्थ
दूरेण: बहुत दूर से; हि: निश्चय ही; अवरम्: नीच; कर्म: कर्म; बुद्धियोगात्: बुद्धियोग (समबुद्धि) से; धनञ्जय: हे धनञ्जय; बुद्धौ: बुद्धि में; शरणम्: शरण; अन्विच्छ: खोज; कृपणाः: कृपण (दीन); फलहेतवः: फल के हेतु (इच्छा) वाले।
हिंदी अनुवाद
हे धनञ्जय! बुद्धियोग (समबुद्धि) से कर्म करना साधारण कर्म से बहुत श्रेष्ठ है। इसलिए तू बुद्धि में शरण चाह। फल की इच्छा रखने वाले तो कृपण (दीन) हैं।
English Translation
O Dhananjaya, action performed with the intellect of equanimity is far superior to mere action (for its fruits). Seek refuge in this intellect. Wretched are those who work for results.
टीका / Commentary
बुद्धियोग अर्थात समबुद्धि से किया गया कर्म श्रेष्ठ है। फल की इच्छा रखने वाले कृपण कहलाते हैं।