आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३० PM | सूर्यास्त: ०५:३१ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 48

अध्याय 2 · श्लोक 48

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||४८||

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya | siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||48||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

योगस्थः: योग में स्थित होकर; कुरु: कर; कर्माणि: कर्म; सङ्गम्: आसक्ति; त्यक्त्वा: त्यागकर; धनञ्जय: हे धनञ्जय; सिद्ध्यसिद्ध्योः: सफलता और असफलता में; समः: समान; भूत्वा: होकर; समत्वम्: समत्व; योगः: योग; उच्यते: कहा जाता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि-असिद्धि में समान होकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व ही योग कहलाता है।

English Translation

Be steadfast in yoga, O Arjuna. Perform your duty, abandoning attachment, and be equal in success and failure. Such equanimity is called yoga.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

समत्व – सफलता और असफलता में समान भाव – यही योग है। योगस्थ होकर कर्म करो।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।