सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 48
श्लोक ४८ में योग की परिभाषा दी गई है – सफलता-असफलता में समान भाव रखना ही योग है।
संस्कृत श्लोक
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||४८||
yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya | siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||48||
पदच्छेद / शब्दार्थ
योगस्थः: योग में स्थित होकर; कुरु: कर; कर्माणि: कर्म; सङ्गम्: आसक्ति; त्यक्त्वा: त्यागकर; धनञ्जय: हे धनञ्जय; सिद्ध्यसिद्ध्योः: सफलता और असफलता में; समः: समान; भूत्वा: होकर; समत्वम्: समत्व; योगः: योग; उच्यते: कहा जाता है।
हिंदी अनुवाद
हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि-असिद्धि में समान होकर, योग में स्थिर होकर कर्म कर। समत्व ही योग कहलाता है।
English Translation
Be steadfast in yoga, O Arjuna. Perform your duty, abandoning attachment, and be equal in success and failure. Such equanimity is called yoga.
टीका / Commentary
समत्व – सफलता और असफलता में समान भाव – यही योग है। योगस्थ होकर कर्म करो।