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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 47

अध्याय 2 · श्लोक 47

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||४७||

karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||47||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कर्मणि: कर्म में; एव: ही; अधिकारः: अधिकार; ते: तेरा; मा: नहीं; फलेषु: फलों में; कदाचन: कभी; मा: मत; कर्मफलहेतुः: कर्मफल का हेतु (कारण); भूः: हो; मा: मत; ते: तेरा; सङ्गः: आसक्ति; अस्तु: हो; अकर्मणि: कर्म न करने में।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत हो, और तेरी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो।

English Translation

You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action. Never consider yourself to be the cause of the results of your activities, and never be attached to not doing your duty.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है – कर्मयोग का सार। केवल कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। फल के प्रति आसक्ति न रखो, और कर्म न करने का भी आग्रह मत करो।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।