सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 47
श्लोक ४७ में कर्मयोग का सिद्धान्त – कर्म करो, फल की इच्छा मत करो – प्रतिपादित है।
संस्कृत श्लोक
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||४७||
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana | mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo 'stv akarmaṇi ||47||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कर्मणि: कर्म में; एव: ही; अधिकारः: अधिकार; ते: तेरा; मा: नहीं; फलेषु: फलों में; कदाचन: कभी; मा: मत; कर्मफलहेतुः: कर्मफल का हेतु (कारण); भूः: हो; मा: मत; ते: तेरा; सङ्गः: आसक्ति; अस्तु: हो; अकर्मणि: कर्म न करने में।
हिंदी अनुवाद
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मफल का हेतु मत हो, और तेरी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में भी आसक्ति न हो।
English Translation
You have a right to perform your prescribed duty, but you are not entitled to the fruits of action. Never consider yourself to be the cause of the results of your activities, and never be attached to not doing your duty.
टीका / Commentary
यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है – कर्मयोग का सार। केवल कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। फल के प्रति आसक्ति न रखो, और कर्म न करने का भी आग्रह मत करो।