सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 46

श्लोक ४६ में आत्मज्ञानी के लिए वेदों की तुलना बाढ़ में कुएँ से की गई है।

संस्कृत श्लोक

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||४६||

yāvān artha udapāne sarvataḥ samplutodake | tāvān sarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||46||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यावान्: जितना; अर्थः: प्रयोजन; उदपाने: जलाशय (कुएँ) में; सर्वतः: सब ओर से; सम्प्लुतोदके: बाढ़ से भरे हुए जल में; तावान्: उतना ही; सर्वेषु: सब; वेदेषु: वेदों में; ब्राह्मणस्य: ब्राह्मण (ज्ञानी) का; विजानतः: जानने वाले का।

हिंदी अनुवाद

जैसे सब ओर से जल से भरे हुए जलाशय में कुएँ का थोड़ा-सा जल जितना उपयोगी होता है, उतना ही जानने वाले ब्राह्मण (आत्मज्ञानी) के लिए सब वेद उपयोगी होते हैं।

English Translation

To a Brahmana who has realized the Self, all the Vedas are as useful as a reservoir of water when there is a flood everywhere.

टीका / Commentary

जब सर्वत्र जल ही जल हो, तो कुएँ के जल की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रहती। उसी प्रकार आत्मज्ञानी के लिए वेदों का भी कोई विशेष प्रयोजन नहीं रहता, क्योंकि वह स्वयं परिपूर्ण है।