आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३० PM | सूर्यास्त: ०५:३१ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 46

अध्याय 2 · श्लोक 46

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ||४६||

yāvān artha udapāne sarvataḥ samplutodake | tāvān sarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||46||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यावान्: जितना; अर्थः: प्रयोजन; उदपाने: जलाशय (कुएँ) में; सर्वतः: सब ओर से; सम्प्लुतोदके: बाढ़ से भरे हुए जल में; तावान्: उतना ही; सर्वेषु: सब; वेदेषु: वेदों में; ब्राह्मणस्य: ब्राह्मण (ज्ञानी) का; विजानतः: जानने वाले का।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जैसे सब ओर से जल से भरे हुए जलाशय में कुएँ का थोड़ा-सा जल जितना उपयोगी होता है, उतना ही जानने वाले ब्राह्मण (आत्मज्ञानी) के लिए सब वेद उपयोगी होते हैं।

English Translation

To a Brahmana who has realized the Self, all the Vedas are as useful as a reservoir of water when there is a flood everywhere.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जब सर्वत्र जल ही जल हो, तो कुएँ के जल की कोई विशेष आवश्यकता नहीं रहती। उसी प्रकार आत्मज्ञानी के लिए वेदों का भी कोई विशेष प्रयोजन नहीं रहता, क्योंकि वह स्वयं परिपूर्ण है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।