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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 45

अध्याय 2 · श्लोक 45

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||४५||

trai-guṇya-viṣayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna | nirdvandvo nitya-sattva-stho nir-yoga-kṣema ātmavān ||45||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

त्रैगुण्यविषयाः: तीनों गुणों के विषय वाले; वेदाः: वेद; निस्त्रैगुण्यः: तीनों गुणों से रहित; भव: हो; अर्जुन: हे अर्जुन; निर्द्वन्द्वः: द्वन्द्वों से रहित; नित्यसत्त्वस्थः: नित्य सत्त्वगुण में स्थित; निर्योगक्षेमः: योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा) की चिन्ता से रहित; आत्मवान्: आत्मनिष्ठ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों के विषय में बताते हैं। तू तीनों गुणों से रहित, द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्त्वगुण में स्थित, योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा) की चिन्ता से रहित और आत्मनिष्ठ हो।

English Translation

The Vedas deal with the three gunas. Be free, O Arjuna, from the three gunas, from the pairs of opposites, and ever abiding in purity (sattva), without desire for acquisition and preservation, and established in the Self.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण अर्जुन को वेदों के कर्मकाण्ड से ऊपर उठने की सलाह देते हैं। वेद भी अन्ततः तीन गुणों के विषय में हैं, पर साधक को गुणातीत होना चाहिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।