सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 45
श्लोक ४५ में कृष्ण कहते हैं कि वेद तीन गुणों में हैं, तू उनसे ऊपर उठकर आत्मनिष्ठ हो।
संस्कृत श्लोक
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||४५||
trai-guṇya-viṣayā vedā nistrai-guṇyo bhavārjuna | nirdvandvo nitya-sattva-stho nir-yoga-kṣema ātmavān ||45||
पदच्छेद / शब्दार्थ
त्रैगुण्यविषयाः: तीनों गुणों के विषय वाले; वेदाः: वेद; निस्त्रैगुण्यः: तीनों गुणों से रहित; भव: हो; अर्जुन: हे अर्जुन; निर्द्वन्द्वः: द्वन्द्वों से रहित; नित्यसत्त्वस्थः: नित्य सत्त्वगुण में स्थित; निर्योगक्षेमः: योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा) की चिन्ता से रहित; आत्मवान्: आत्मनिष्ठ।
हिंदी अनुवाद
हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों के विषय में बताते हैं। तू तीनों गुणों से रहित, द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्त्वगुण में स्थित, योगक्षेम (प्राप्ति और रक्षा) की चिन्ता से रहित और आत्मनिष्ठ हो।
English Translation
The Vedas deal with the three gunas. Be free, O Arjuna, from the three gunas, from the pairs of opposites, and ever abiding in purity (sattva), without desire for acquisition and preservation, and established in the Self.
टीका / Commentary
कृष्ण अर्जुन को वेदों के कर्मकाण्ड से ऊपर उठने की सलाह देते हैं। वेद भी अन्ततः तीन गुणों के विषय में हैं, पर साधक को गुणातीत होना चाहिए।