सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 44
श्लोक ४४ में बताया गया है कि भोगासक्त लोगों की बुद्धि समाधि में नहीं लग सकती।
संस्कृत श्लोक
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||४४||
bhogaiśvarya-prasaktānāṃ tayāpahṛta-cetasām | vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||44||
पदच्छेद / शब्दार्थ
भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्: भोग और ऐश्वर्य में आसक्त; तया: उस (वाणी) से; अपहृतचेतसाम्: चुराए हुए चित्त वाले; व्यवसायात्मिका: निश्चयात्मिका; बुद्धिः: बुद्धि; समाधौ: समाधि (परमात्मा) में; न: नहीं; विधीयते: स्थित होती।
हिंदी अनुवाद
भोग और ऐश्वर्य में आसक्त और उस (पुष्पित वाणी) से चित्त हरे हुए पुरुषों की निश्चयात्मिका बुद्धि समाधि में नहीं लगती।
English Translation
For those who are attached to pleasure and power, and whose minds are carried away by such (flowery) words, the resolute intellect that leads to samadhi is not formed.
टीका / Commentary
जिनका मन भोग-विलास में फँसा है, वे एकाग्र बुद्धि से परमात्मा में नहीं लग सकते। उनकी बुद्धि विचलित रहती है।