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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 44

अध्याय 2 · श्लोक 44

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||४४||

bhogaiśvarya-prasaktānāṃ tayāpahṛta-cetasām | vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||44||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्: भोग और ऐश्वर्य में आसक्त; तया: उस (वाणी) से; अपहृतचेतसाम्: चुराए हुए चित्त वाले; व्यवसायात्मिका: निश्चयात्मिका; बुद्धिः: बुद्धि; समाधौ: समाधि (परमात्मा) में; न: नहीं; विधीयते: स्थित होती।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

भोग और ऐश्वर्य में आसक्त और उस (पुष्पित वाणी) से चित्त हरे हुए पुरुषों की निश्चयात्मिका बुद्धि समाधि में नहीं लगती।

English Translation

For those who are attached to pleasure and power, and whose minds are carried away by such (flowery) words, the resolute intellect that leads to samadhi is not formed.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जिनका मन भोग-विलास में फँसा है, वे एकाग्र बुद्धि से परमात्मा में नहीं लग सकते। उनकी बुद्धि विचलित रहती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।