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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 43

अध्याय 2 · श्लोक 43

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||४३||

kāmātmānaḥ svarga-parā janma-karma-phala-pradām | kriyā-viśeṣa-bahulāṃ bhoga-aiśvarya-gatiṃ prati ||43||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कामात्मानः: कामनाओं से युक्त; स्वर्गपराः: स्वर्ग को परम मानने वाले; जन्मकर्मफलप्रदाम्: जन्म और कर्मों के फल देने वाली; क्रियाविशेषबहुलाम्: अनेक प्रकार की क्रियाओं से भरपूर; भोगैश्वर्यगतिम्: भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए; प्रति: की ओर।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो कामनाओं से युक्त हैं, स्वर्ग को परम मानते हैं, और भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार की क्रियाओं में लगे रहते हैं – वे जन्म और कर्मफल देने वाली (गति को प्राप्त होते हैं)।

English Translation

Those who are full of desires, who regard heaven as the supreme goal, and who are engrossed in the various specific rites for the attainment of pleasure and power – they are born and die again and again.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ऐसे लोग पुनर्जन्म के चक्र में फँसे रहते हैं। वे भोग और ऐश्वर्य के लिए तरह-तरह के कर्म करते हैं, पर मुक्ति नहीं पाते।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।