सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 43
श्लोक ४३ में कामनाओं से ग्रस्त और स्वर्ग को ही परम मानने वालों की दशा बताई गई है।
संस्कृत श्लोक
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||४३||
kāmātmānaḥ svarga-parā janma-karma-phala-pradām | kriyā-viśeṣa-bahulāṃ bhoga-aiśvarya-gatiṃ prati ||43||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कामात्मानः: कामनाओं से युक्त; स्वर्गपराः: स्वर्ग को परम मानने वाले; जन्मकर्मफलप्रदाम्: जन्म और कर्मों के फल देने वाली; क्रियाविशेषबहुलाम्: अनेक प्रकार की क्रियाओं से भरपूर; भोगैश्वर्यगतिम्: भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए; प्रति: की ओर।
हिंदी अनुवाद
जो कामनाओं से युक्त हैं, स्वर्ग को परम मानते हैं, और भोग-ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार की क्रियाओं में लगे रहते हैं – वे जन्म और कर्मफल देने वाली (गति को प्राप्त होते हैं)।
English Translation
Those who are full of desires, who regard heaven as the supreme goal, and who are engrossed in the various specific rites for the attainment of pleasure and power – they are born and die again and again.
टीका / Commentary
ऐसे लोग पुनर्जन्म के चक्र में फँसे रहते हैं। वे भोग और ऐश्वर्य के लिए तरह-तरह के कर्म करते हैं, पर मुक्ति नहीं पाते।