सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 42

श्लोक ४२ में उन लोगों का वर्णन है जो वेदों के शाब्दिक अर्थ में उलझे रहते हैं।

संस्कृत श्लोक

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः | वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ||४२||

yām imāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadanty avipaścitaḥ | veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ ||42||

पदच्छेद / शब्दार्थ

याम्: जो; इमाम्: यह; पुष्पिताम्: पुष्पित (फूलों-सी सुन्दर); वाचम्: वाणी; प्रवदन्ति: कहते हैं; अविपश्चितः: अविवेकी; वेदवादरताः: वेदों के वादों में आसक्त; पार्थ: हे पार्थ; न: नहीं; अन्यत्: दूसरा; अस्ति: है; इति: इस प्रकार; वादिनः: वाद करने वाले।

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो अविवेकी पुरुष वेदों के वाक्यों में आसक्त रहते हैं और 'इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं' ऐसा वाद करते हैं, वे इस पुष्पित (सुन्दर) वाणी को बोलते हैं।

English Translation

O Partha, the undiscerning who delight in the letter of the Vedas and declare that there is nothing else, utter flowery speech.

टीका / Commentary

कृष्ण उन लोगों की निन्दा करते हैं जो केवल वेदों के कर्मकाण्डीय भाग को ही सब कुछ मानते हैं, और उसके गूढ़ार्थ को नहीं समझते।