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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 42

अध्याय 2 · श्लोक 42

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः | वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ||४२||

yām imāṃ puṣpitāṃ vācaṃ pravadanty avipaścitaḥ | veda-vāda-ratāḥ pārtha nānyad astīti vādinaḥ ||42||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

याम्: जो; इमाम्: यह; पुष्पिताम्: पुष्पित (फूलों-सी सुन्दर); वाचम्: वाणी; प्रवदन्ति: कहते हैं; अविपश्चितः: अविवेकी; वेदवादरताः: वेदों के वादों में आसक्त; पार्थ: हे पार्थ; न: नहीं; अन्यत्: दूसरा; अस्ति: है; इति: इस प्रकार; वादिनः: वाद करने वाले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! जो अविवेकी पुरुष वेदों के वाक्यों में आसक्त रहते हैं और 'इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं' ऐसा वाद करते हैं, वे इस पुष्पित (सुन्दर) वाणी को बोलते हैं।

English Translation

O Partha, the undiscerning who delight in the letter of the Vedas and declare that there is nothing else, utter flowery speech.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कृष्ण उन लोगों की निन्दा करते हैं जो केवल वेदों के कर्मकाण्डीय भाग को ही सब कुछ मानते हैं, और उसके गूढ़ार्थ को नहीं समझते।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।