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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 41

अध्याय 2 · श्लोक 41

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||४१||

vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana | bahu-śākhā hy anantāś ca buddhayo 'vyavasāyinām ||41||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

व्यवसायात्मिका: निश्चयात्मिका; बुद्धिः: बुद्धि; एका: एक; इह: इस (कर्मयोग) में; कुरुनन्दन: हे कुरुनन्दन; बहुशाखाः: अनेक शाखाओं वाली; हि: निश्चय ही; अनन्ताः: अनन्त; च: और; बुद्धयः: बुद्धियाँ; अव्यवसायिनाम्: अव्यवसायी (बिना निश्चय वाले) पुरुषों की।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कुरुनन्दन! इस (कर्मयोग) में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी (अनिश्चित) पुरुषों की बुद्धियाँ बहुत शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।

English Translation

In this path, O joy of the Kurus, the resolute intellect is single-pointed. The thoughts of the irresolute are many-branched and endless.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

एकाग्र बुद्धि से किए गए कर्म ही सफल होते हैं। अनिश्चित बुद्धि वाले अनेक विकल्पों में भटकते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।