सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 41
श्लोक ४१ में एकाग्र बुद्धि और अनिश्चित बुद्धि का अन्तर बताया गया है।
संस्कृत श्लोक
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||४१||
vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana | bahu-śākhā hy anantāś ca buddhayo 'vyavasāyinām ||41||
पदच्छेद / शब्दार्थ
व्यवसायात्मिका: निश्चयात्मिका; बुद्धिः: बुद्धि; एका: एक; इह: इस (कर्मयोग) में; कुरुनन्दन: हे कुरुनन्दन; बहुशाखाः: अनेक शाखाओं वाली; हि: निश्चय ही; अनन्ताः: अनन्त; च: और; बुद्धयः: बुद्धियाँ; अव्यवसायिनाम्: अव्यवसायी (बिना निश्चय वाले) पुरुषों की।
हिंदी अनुवाद
हे कुरुनन्दन! इस (कर्मयोग) में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी (अनिश्चित) पुरुषों की बुद्धियाँ बहुत शाखाओं वाली और अनन्त होती हैं।
English Translation
In this path, O joy of the Kurus, the resolute intellect is single-pointed. The thoughts of the irresolute are many-branched and endless.
टीका / Commentary
एकाग्र बुद्धि से किए गए कर्म ही सफल होते हैं। अनिश्चित बुद्धि वाले अनेक विकल्पों में भटकते हैं।