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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 40

अध्याय 2 · श्लोक 40

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||४०||

nehābhikrama-nāśo 'sti pratyavāyo na vidyate | svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||40||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; इह: इस (कर्मयोग) में; अभिक्रमनाशः: आरम्भ का नाश; अस्ति: है; प्रत्यवायः: विघ्न (बाधा); न: नहीं; विद्यते: है; स्वल्पम्: थोड़ा सा; अपि: भी; अस्य: इस; धर्मस्य: धर्म (कर्मयोग) का; त्रायते: रक्षा करता है; महतः: बड़े; भयात्: भय से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस (कर्मयोग) में आरम्भ का नाश नहीं होता और उल्टा फल (प्रत्यवाय) भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास बड़े भय से रक्षा करता है।

English Translation

In this path, there is no loss of effort, nor is there any adverse result. Even a little practice of this discipline protects one from great fear.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कर्मयोग की महिमा – इसमें किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता, और इसका थोड़ा सा अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के भय से बचा लेता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।