सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 40
श्लोक ४० में कर्मयोग की विशेषता बताई गई है – इसमें किए गए कर्म का कभी नाश नहीं होता, और थोड़ा सा अभ्यास भी बड़े भय से बचाता है।
संस्कृत श्लोक
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||४०||
nehābhikrama-nāśo 'sti pratyavāyo na vidyate | svalpam apy asya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||40||
पदच्छेद / शब्दार्थ
न: नहीं; इह: इस (कर्मयोग) में; अभिक्रमनाशः: आरम्भ का नाश; अस्ति: है; प्रत्यवायः: विघ्न (बाधा); न: नहीं; विद्यते: है; स्वल्पम्: थोड़ा सा; अपि: भी; अस्य: इस; धर्मस्य: धर्म (कर्मयोग) का; त्रायते: रक्षा करता है; महतः: बड़े; भयात्: भय से।
हिंदी अनुवाद
इस (कर्मयोग) में आरम्भ का नाश नहीं होता और उल्टा फल (प्रत्यवाय) भी नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास बड़े भय से रक्षा करता है।
English Translation
In this path, there is no loss of effort, nor is there any adverse result. Even a little practice of this discipline protects one from great fear.
टीका / Commentary
कर्मयोग की महिमा – इसमें किया हुआ कर्म कभी नष्ट नहीं होता, और इसका थोड़ा सा अभ्यास भी जन्म-मृत्यु के भय से बचा लेता है।