सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 32

श्लोक ३२ में कहा गया है कि ऐसा युद्ध जो अपने आप प्राप्त हुआ है, वह स्वर्ग का द्वार है – इसे पाकर क्षत्रिय धन्य हैं।

संस्कृत श्लोक

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् | सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ||३२||

yadṛcchayā copapannaṃ svarga-dvāram apāvṛtam | sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddham īdṛśam ||32||

पदच्छेद / शब्दार्थ

यदृच्छया: अपने आप, अकारण; च: और; उपपन्नम्: प्राप्त; स्वर्गद्वारम्: स्वर्ग का द्वार; अपावृतम्: खुला हुआ; सुखिनः: सौभाग्यशाली; क्षत्रियाः: क्षत्रिय; पार्थ: हे पार्थ; लभन्ते: पाते हैं; युद्धम्: युद्ध; ईदृशम्: ऐसा।

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! ऐसा युद्ध जो बिना माँगे ही प्राप्त हुआ है और स्वर्ग का खुला द्वार है, उसे पाकर क्षत्रिय सौभाग्यशाली होते हैं।

English Translation

O Partha, happy are the Kshatriyas who get such an open door to heaven, offered by chance.

टीका / Commentary

यह युद्ध स्वतः ही (यदृच्छया) प्राप्त हुआ है और यह स्वर्ग का द्वार खोलने वाला है। ऐसा अवसर क्षत्रिय के लिए सौभाग्य की बात है।