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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 31

अध्याय 2 · श्लोक 31

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||३१||

sva-dharmam api cāvekṣya na vikampitum arhasi | dharmyāddhi yuddhāc chreyo 'nyat kṣatriyasya na vidyate ||31||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

स्वधर्मम्: अपने धर्म को; अपि: भी; च: और; अवेक्ष्य: देखकर; न: नहीं; विकम्पितुम्: कम्पित होना; अर्हसि: योग्य है; धर्म्यात्: धर्मयुक्त; हि: निश्चय ही; युद्धात्: युद्ध से; श्रेयः: श्रेष्ठ; अन्यत्: अन्य; क्षत्रियस्य: क्षत्रिय के लिए; न: नहीं; विद्यते: है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अपने स्वधर्म को देखते हुए भी तुझे विकम्पित (डिगना) नहीं चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है।

English Translation

Further, considering your own duty, you should not waver. For a Kshatriya, there is nothing more auspicious than a righteous war.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अब कृष्ण स्वधर्म के आधार पर अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं। क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।