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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 30

अध्याय 2 · श्लोक 30

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||३०||

dehī nityam avadhyo 'yaṃ dehe sarvasya bhārata | tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitum arhasi ||30||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

देही: शरीरी (आत्मा); नित्यम्: सदा; अवध्यः: अवध्य; अयम्: यह; देहे: शरीर में; सर्वस्य: सबका; भारत: हे भारत; तस्मात्: इसलिए; सर्वाणि: सभी; भूतानि: प्राणियों के लिए; न: नहीं; त्वम्: तू; शोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: योग्य है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भारत! यह आत्मा सबके शरीर में स्थित है और सदा अवध्य (न मारा जा सकने वाला) है। इसलिए तू सभी प्राणियों के लिए शोक करने योग्य नहीं है।

English Translation

O Bharata, this Self dwelling in the body of all is eternally inviolable. Therefore, you should not grieve for any being.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

निष्कर्ष रूप में कृष्ण कहते हैं कि सभी प्राणियों की आत्मा अवध्य है। अतः किसी के लिए भी शोक नहीं करना चाहिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।