सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 30
श्लोक ३० में निष्कर्ष दिया गया है कि सभी प्राणियों की आत्मा अविनाशी है, अतः शोक न करें।
संस्कृत श्लोक
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||३०||
dehī nityam avadhyo 'yaṃ dehe sarvasya bhārata | tasmāt sarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitum arhasi ||30||
पदच्छेद / शब्दार्थ
देही: शरीरी (आत्मा); नित्यम्: सदा; अवध्यः: अवध्य; अयम्: यह; देहे: शरीर में; सर्वस्य: सबका; भारत: हे भारत; तस्मात्: इसलिए; सर्वाणि: सभी; भूतानि: प्राणियों के लिए; न: नहीं; त्वम्: तू; शोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: योग्य है।
हिंदी अनुवाद
हे भारत! यह आत्मा सबके शरीर में स्थित है और सदा अवध्य (न मारा जा सकने वाला) है। इसलिए तू सभी प्राणियों के लिए शोक करने योग्य नहीं है।
English Translation
O Bharata, this Self dwelling in the body of all is eternally inviolable. Therefore, you should not grieve for any being.
टीका / Commentary
निष्कर्ष रूप में कृष्ण कहते हैं कि सभी प्राणियों की आत्मा अवध्य है। अतः किसी के लिए भी शोक नहीं करना चाहिए।