सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 29

श्लोक २९ में आत्मा के दुर्बोध होने का वर्णन है – कोई उसे आश्चर्य से देखता है, कोई सुनता है, पर समझ पाना अति कठिन है।

संस्कृत श्लोक

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः | आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ||२९||

āścaryavat paśyati kaścid enam āścaryavad vadati tathaiva cānyaḥ | āścaryavac cainam anyaḥ śṛṇoti śrutvāpy enaṃ veda na caiva kaścit ||29||

पदच्छेद / शब्दार्थ

आश्चर्यवत्: आश्चर्य के समान; पश्यति: देखता है; कश्चित्: कोई; एनम्: इस (आत्मा) को; आश्चर्यवत्: आश्चर्य की तरह; वदति: कहता है; तथा: वैसे; एव: ही; च: और; अन्यः: दूसरा; आश्चर्यवत्: आश्चर्य की तरह; च: और; एनम्: इसको; अन्यः: दूसरा; शृणोति: सुनता है; श्रुत्वा: सुनकर; अपि: भी; एनम्: इसको; वेद: जानता है; न: नहीं; च: और; एव: निश्चय ही; कश्चित्: कोई।

हिंदी अनुवाद

कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह वर्णन करता है, और कोई आश्चर्य की तरह सुनता है। परन्तु कोई सुनकर भी नहीं जानता।

English Translation

Some look upon this Self as a wonder, some speak of it as a wonder, and some hear of it as a wonder. Yet others, even after hearing, do not understand it at all.

टीका / Commentary

आत्मा अत्यन्त गूढ़ है। उसे देखना, बताना, सुनना भी दुर्लभ है। और सुनकर भी उसे समझ पाना और भी कठिन। यह आत्मा की अचिन्त्यता को दर्शाता है।