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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 29

अध्याय 2 · श्लोक 29

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः | आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ||२९||

āścaryavat paśyati kaścid enam āścaryavad vadati tathaiva cānyaḥ | āścaryavac cainam anyaḥ śṛṇoti śrutvāpy enaṃ veda na caiva kaścit ||29||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

आश्चर्यवत्: आश्चर्य के समान; पश्यति: देखता है; कश्चित्: कोई; एनम्: इस (आत्मा) को; आश्चर्यवत्: आश्चर्य की तरह; वदति: कहता है; तथा: वैसे; एव: ही; च: और; अन्यः: दूसरा; आश्चर्यवत्: आश्चर्य की तरह; च: और; एनम्: इसको; अन्यः: दूसरा; शृणोति: सुनता है; श्रुत्वा: सुनकर; अपि: भी; एनम्: इसको; वेद: जानता है; न: नहीं; च: और; एव: निश्चय ही; कश्चित्: कोई।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह वर्णन करता है, और कोई आश्चर्य की तरह सुनता है। परन्तु कोई सुनकर भी नहीं जानता।

English Translation

Some look upon this Self as a wonder, some speak of it as a wonder, and some hear of it as a wonder. Yet others, even after hearing, do not understand it at all.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आत्मा अत्यन्त गूढ़ है। उसे देखना, बताना, सुनना भी दुर्लभ है। और सुनकर भी उसे समझ पाना और भी कठिन। यह आत्मा की अचिन्त्यता को दर्शाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।