सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 3

श्लोक ३ में कृष्ण अर्जुन से आग्रह करते हैं कि वे इस दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हों।

संस्कृत श्लोक

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||३||

klaibyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayy upapadyate | kṣudraṃ hṛdaya-daurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa ||3||

पदच्छेद / शब्दार्थ

क्लैब्यम्: नपुंसकता; मा स्म गमः: मत जा; पार्थ: हे पृथापुत्र; न: नहीं; एतत्: यह; त्वयि: तुझमें; उपपद्यते: उचित है; क्षुद्रम्: तुच्छ; हृदयदौर्बल्यम्: हृदय की दुर्बलता; त्यक्त्वा: त्याग कर; उत्तिष्ठ: खड़ा हो; परन्तप: हे शत्रुतापन।

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो। यह तुझमें उचित नहीं है। हे शत्रुतापन! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर खड़ा हो जा।

English Translation

O Partha, yield not to unmanliness. It does not befit you. O scorcher of foes, give up this petty faint-heartedness and arise!

टीका / Commentary

कृष्ण अब अर्जुन को उनकी क्षत्रिय प्रकृति का स्मरण कराते हैं। "पार्थ" और "परन्तप" सम्बोधन जानबूझकर हैं – वे अर्जुन को उनकी वीरता और कुल की याद दिलाते हैं। "क्लैब्य" (नपुंसकता) शब्द कठोर है, क्योंकि युद्ध से पीछे हटना एक क्षत्रिय के लिए सबसे बड़ा कलंक है।