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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 2

अध्याय 2 · श्लोक 2

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ||२||

śrī-bhagavān uvāca | kutastvā kaśmalam idaṃ viṣame samupasthitam | anārya-juṣṭam asvargyam akīrti-karam arjuna ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान श्रीकृष्ण; उवाच: बोले; कुतः: कहाँ से; त्वा: तुझे; कश्मलम्: मोह; इदम्: यह; विषमे: विषम परिस्थिति में; समुपस्थितम्: प्राप्त हुआ; अनार्यजुष्टम्: आर्यों द्वारा न आचरित; अस्वर्ग्यम्: स्वर्ग को न देने वाला; अकीर्तिकरम्: अपयशकारी; अर्जुन: हे अर्जुन।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे अर्जुन! इस विषम परिस्थिति में तुझे यह मोह कहाँ से प्राप्त हुआ? यह आर्यों (सज्जनों) द्वारा आचरण न किया जाने वाला, स्वर्ग को न देने वाला और अपयशकारी है।

English Translation

The Supreme Lord said: O Arjuna, how has this delusion overcome you in this hour of peril? It is not practiced by those who are noble; it leads not to heaven, but to infamy.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अर्जुन की स्थिति पर आश्चर्य प्रकट करते हैं। यह मोह असमय में आया है और यह किसी सभ्य व्यक्ति के लिए उचित नहीं। "अनार्यजुष्टम्" कहकर वे संकेत देते हैं कि ऐसा व्यवहार तो अनार्यों (असभ्य) का लक्षण है। साथ ही यह न तो स्वर्ग देगा और न ही कीर्ति।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।