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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 27

अध्याय 2 · श्लोक 27

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||२७||

jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṃ janma mṛtasya ca | tasmād aparihārye 'rthe na tvaṃ śocitum arhasi ||27||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

जातस्य: जन्मे हुए की; हि: निश्चय ही; ध्रुवः: निश्चित; मृत्युः: मृत्यु; ध्रुवम्: निश्चित; जन्म: जन्म; मृतस्य: मरे हुए का; च: और; तस्मात्: इसलिए; अपरिहार्ये: अवश्यम्भावी; अर्थे: विषय में; न: नहीं; त्वम्: तू; शोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: योग्य है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य (अवश्यम्भावी) विषय में तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

English Translation

For one who is born, death is certain; for one who dies, birth is certain. Therefore, you should not grieve over what is inevitable.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जन्म-मृत्यु का चक्र अटल है। यह संसार का नियम है। जो अटल है, उसके लिए शोक करना मूर्खता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।