सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 27

श्लोक २७ में जन्म और मृत्यु की अनिवार्यता बताई गई है।

संस्कृत श्लोक

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||२७||

jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṃ janma mṛtasya ca | tasmād aparihārye 'rthe na tvaṃ śocitum arhasi ||27||

पदच्छेद / शब्दार्थ

जातस्य: जन्मे हुए की; हि: निश्चय ही; ध्रुवः: निश्चित; मृत्युः: मृत्यु; ध्रुवम्: निश्चित; जन्म: जन्म; मृतस्य: मरे हुए का; च: और; तस्मात्: इसलिए; अपरिहार्ये: अवश्यम्भावी; अर्थे: विषय में; न: नहीं; त्वम्: तू; शोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: योग्य है।

हिंदी अनुवाद

जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य (अवश्यम्भावी) विषय में तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

English Translation

For one who is born, death is certain; for one who dies, birth is certain. Therefore, you should not grieve over what is inevitable.

टीका / Commentary

जन्म-मृत्यु का चक्र अटल है। यह संसार का नियम है। जो अटल है, उसके लिए शोक करना मूर्खता है।