सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 26

श्लोक २६ में कहा गया है कि भले ही शरीर को नित्य नाशवान मानो, फिर भी शोक उचित नहीं।

संस्कृत श्लोक

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||२६||

atha cainaṃ nitya-jātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam | tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitum arhasi ||26||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अथ: अब; च: और; एनम्: इस (शरीर) को; नित्यजातम्: बार-बार जन्मने वाला; नित्यम्: सदा; वा: या; मन्यसे: मानते हो; मृतम्: मरने वाला; तथापि: तो भी; त्वम्: तू; महाबाहो: हे महाबाहो; न: नहीं; एवम्: इस प्रकार; शोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: योग्य है।

हिंदी अनुवाद

और यदि तू इस (शरीर) को बार-बार जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानता है, तब भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

English Translation

Even if you think that this (body) is constantly born and constantly dies, even then, O mighty-armed, you should not grieve.

टीका / Commentary

यदि कोई आत्मा की अमरता नहीं मानता, तो भी शोक का कोई कारण नहीं, क्योंकि जो जन्मता है वह मरेगा ही – यह नियम है।