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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 26

अध्याय 2 · श्लोक 26

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||२६||

atha cainaṃ nitya-jātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam | tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitum arhasi ||26||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अथ: अब; च: और; एनम्: इस (शरीर) को; नित्यजातम्: बार-बार जन्मने वाला; नित्यम्: सदा; वा: या; मन्यसे: मानते हो; मृतम्: मरने वाला; तथापि: तो भी; त्वम्: तू; महाबाहो: हे महाबाहो; न: नहीं; एवम्: इस प्रकार; शोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: योग्य है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

और यदि तू इस (शरीर) को बार-बार जन्मने वाला और सदा मरने वाला मानता है, तब भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।

English Translation

Even if you think that this (body) is constantly born and constantly dies, even then, O mighty-armed, you should not grieve.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यदि कोई आत्मा की अमरता नहीं मानता, तो भी शोक का कोई कारण नहीं, क्योंकि जो जन्मता है वह मरेगा ही – यह नियम है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।