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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 · श्लोक 25

अध्याय 2 · श्लोक 25

सांख्य योग (Sankhya Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते | तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ||२५||

avyakto 'yam acintyo 'yam avikāryo 'yam ucyate | tasmād evaṃ viditvainaṃ nānuśocitum arhasi ||25||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अव्यक्तः: अव्यक्त (इन्द्रियों से परे); अयम्: यह; अचिन्त्यः: अचिन्त्य; अयम्: यह; अविकार्यः: अविकारी; अयम्: यह; उच्यते: कहा जाता है; तस्मात्: इसलिए; एवम्: इस प्रकार; विदित्वा: जानकर; एनम्: इस (आत्मा) को; न: नहीं; अनुशोचितुम्: शोक करना; अर्हसि: तू योग्य है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यह आत्मा अव्यक्त (प्रकट न होने वाला), अचिन्त्य और अविकारी कहा गया है। इसलिए उसे इस प्रकार जानकर तुझे शोक नहीं करना चाहिए।

English Translation

It is said that this Self is unmanifest, inconceivable, and unchangeable. Therefore, knowing it as such, you should not grieve.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी है – ये तीन विशेषण उसे भौतिक जगत से पूरी तरह अलग करते हैं। इसे जानकर शोक व्यर्थ है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।