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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 8

अध्याय 18 · श्लोक 8

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८॥

duḥkham ity eva yat kāya-kleśa-bhayāt tyajet | sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ naiva tyāga-phalaṃ labhet ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दुःखम्: painful; इति: thus; एव: indeed; यत्: which; कर्म: action; काय-क्लेश-भयात्: from fear of bodily trouble; त्यजेत्: one may renounce; सः: that person; कृत्वा: having done; राजसम्: in the mode of passion; त्यागम्: renunciation; न: not; एव: indeed; त्याग-फलम्: fruit of renunciation; लभेत्: obtains.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो कर्म दुःखरूप है, ऐसा मानकर शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, वह राजस त्याग करता है और उसे त्याग का फल नहीं मिलता।

English Translation

If one renounces a prescribed action because it is troublesome or from fear of bodily pain, he performs renunciation in the mode of passion and does not obtain the fruit of renunciation.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

कुछ लोग कर्म को कठिन या शरीर को कष्ट देने वाला समझकर त्याग देते हैं। यह राजस त्याग है, जो सात्त्विक त्याग के फल से वंचित रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।