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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 6

अध्याय 18 · श्लोक 6

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६॥

etāny api tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca | kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matam uttamam ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एतानि: these; अपि: also; तु: indeed; कर्माणि: actions; सङ्गम्: attachment; त्यक्त्वा: having abandoned; फलानि: fruits; च: and; कर्तव्यानि: ought to be done; इति: thus; मे: My; पार्थ: O Partha; निश्चितम्: certain; मतम्: opinion; उत्तमम्: supreme.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों का त्याग करके करना चाहिए - यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।

English Translation

O Partha, these actions should be performed, but after abandoning attachment and the fruits. This is My certain and supreme opinion.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अब स्पष्ट करते हैं कि यज्ञादि कर्म करने चाहिए, परन्तु आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर। यही निष्काम कर्मयोग का सार है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।