श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 5

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 23 मिनट का पठन 152 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
यज्ञ-दान-तपः-कर्म
actions of sacrifice, charity, and austerity
न
not
त्याज्यम्
to be abandoned
कार्यम्
must be performed
एव
indeed
तत्
that
यज्ञः
sacrifice
दानम्
charity
तपः
austerity
च
and
एव
also
पावनानि
purifying
मनीषिणाम्
for the wise.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ, दान और तप - ये कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि करने ही योग्य हैं। यज्ञ, दान और तप विद्वान् पुरुषों को भी पवित्र करने वाले हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म की आधारशिला 'यज्ञ', 'दान' और 'तप' पर टिकी है। श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय का यह पांचवां श्लोक मानव जीवन के उन तीन स्तंभों को परिभाषित करता है, जो न केवल भौतिक जगत में संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाने वाले राजमार्ग भी हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह स्पष्ट निर्देश देते हैं कि इन कर्मों का त्याग कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये कर्म मनुष्य की चेतना को शुद्ध करने वाले 'पावन' साधन हैं।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से देखें तो 'यज्ञ' केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, बल्कि अपने अहंकार को विराट चेतना में विसर्जित करना है। 'दान' का अर्थ केवल वस्तु का त्याग नहीं, बल्कि 'ममत्व' (मेरेपन) की भावना को मिटाकर सर्वव्यापी ईश्वर को प्रत्येक जीव में देखना है। 'तप' का अर्थ है इंद्रियों का संयम और चित्त की एकाग्रता। जब कोई साधक इन तीनों को निष्काम भाव से अपनाता है, तो वह 'मनीषी' (ज्ञानी) बनने की पात्रता प्राप्त करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार से भागना संन्यास नहीं है, बल्कि संसार में रहकर, आसक्ति को त्यागकर, अपने कर्तव्यों का पालन करना ही वास्तविक योग है। यह श्लोक उन लोगों के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश है जो जीवन की भागदौड़ में अपनी आध्यात्मिक जड़ों को खो चुके हैं। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा प्रत्येक कर्म, यदि वह लोक कल्याण और आत्म-शुद्धि के लिए है, तो वह स्वयं में एक यज्ञ है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता रखें। 'यज्ञ' का उच्चारण 'यज-ञ' के रूप में करें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, अतः इसका लयबद्ध पाठ मन में शांति और एकाग्रता का संचार करता है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात, पूर्व दिशा की ओर मुख करके, शांत चित्त से इस श्लोक का तीन बार पाठ करना साधक के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। यह श्लोक हमें स्मरण कराता है कि कर्म का स्वरूप कैसा हो—वह पवित्र, निस्वार्थ और कर्तव्य-परायण होना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यज्ञदानतपःकर्मयज्ञ, दान और तप रूपी कर्मये तीन कर्म आत्मा की शुद्धि के लिए अनिवार्य हैं।
न त्याज्यम्त्यागने योग्य नहीं हैंइनका परित्याग करना अज्ञानता है।
कार्यमेवअवश्य करने चाहिएये कर्तव्य हैं, विकल्प नहीं।
तत्वे (कर्म)निर्धारित आध्यात्मिक अनुष्ठान।
यज्ञःयज्ञ (अग्निहोत्र/सेवा)ईश्वर को समर्पित समस्त शुभ कर्म।
दानम्दान (परोपकार)स्वयं के स्वार्थ का त्याग कर दूसरों की सेवा।
तपःतप (संयम)इंद्रियों को वश में रखने की साधना।
चैवऔर हीये तीनों मिलकर ही पूर्णता प्रदान करते हैं।
पावनानिपवित्र करने वालेचित्त की मलिनता को दूर करने वाले।
मनीषिणाम्मनीषियों (ज्ञानियों) के लिएजो विवेकशील हैं, उनके लिए ये अनिवार्य हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन ने युद्ध से विमुख होकर संन्यास लेने की इच्छा व्यक्त की, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें 'कर्मयोग' का उपदेश दिया। यह श्लोक उसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पौराणिक संदर्भों में, यज्ञ का उद्भव सृष्टि के आरंभ से ही माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में भी भगवान कहते हैं कि प्रजापति ने यज्ञ के साथ ही प्रजा की रचना की थी।

ऋषियों के आश्रमों में यज्ञ, दान और तप का त्रिकोण ही शिक्षा का आधार था। उदाहरण के लिए, राजा बलि ने दान के माध्यम से अपनी कीर्ति को अमर किया, यद्यपि उनके दान में अहंकार का अंश था, जिसे भगवान वामन ने दूर किया। इसी प्रकार, विश्वामित्र ने कठोर 'तप' के बल पर राजर्षि से ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त किया। ये कथाएं हमें सिखाती हैं कि यज्ञ, दान और तप का उद्देश्य केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का संशय यह था कि क्या हिंसात्मक कर्म (युद्ध) भी यज्ञ हो सकता है? भगवान ने स्पष्ट किया कि यदि कर्म आसक्ति रहित होकर, लोक-संग्रह के लिए किया जाए, तो वह यज्ञ ही है। यह श्लोक हमें यह संदेश देता है कि जीवन के प्रत्येक चरण में, चाहे हम गृहस्थ हों या वानप्रस्थ, ये तीन कर्म हमारी आध्यात्मिक यात्रा के अनिवार्य अंग हैं। इनका परित्याग करना अपनी उन्नति के द्वार बंद करने के समान है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • चित्त की शुद्धि: नियमित पाठ से मन में दबे हुए नकारात्मक विचार और कुंठाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं।
  • अहंकार का नाश: दान और यज्ञ की भावना मनुष्य को यह बोध कराती है कि वह केवल एक निमित्त मात्र है, जिससे अहंकार का शमन होता है।
  • इंद्रिय संयम: तप का अभ्यास करने से व्यक्ति की इच्छाशक्ति (Willpower) प्रबल होती है, जिससे वह व्यसनों और विकारों से दूर रहता है।
  • कर्मिक शुद्धिकरण: निष्काम भाव से किए गए कर्म पुराने पापों के प्रभाव को कम करते हैं और पुण्य का संचय करते हैं।
  • मानसिक शांति: कर्तव्य बोध होने से मन में द्वंद्व समाप्त होता है, जिससे गहरी मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • दैवीय कृपा: जो व्यक्ति अपने जीवन को यज्ञमय बनाता है, उस पर ईश्वर की विशेष कृपा और मार्गदर्शन बना रहता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: तप के अभ्यास से ध्यान की गहराई बढ़ती है, जो आत्म-ज्ञान के लिए आवश्यक है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इन कर्मों के निरंतर अभ्यास से साधक के व्यक्तित्व में एक दिव्य ओज और तेज का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय (मोक्षसंन्यासयोग) के पांचवें श्लोक पर आधारित है। हमने इसे गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और शंकराचार्य भाष्य के संदर्भों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत व्याख्या प्रदान करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि वेदों और उपनिषदों में वर्णित 'कर्मयोग' के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पक्ष को उजागर करती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल पढ़ने तक सीमित न रखें, बल्कि अपने दैनिक जीवन के आचरण में उतारने का प्रयास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, गृहस्थ के लिए यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है। अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना, अतिथियों का सत्कार करना और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ईश्वर की सेवा मानकर करना ही गृहस्थ का श्रेष्ठ यज्ञ है।

दान का अर्थ है 'सात्विक दान'। बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के, सही समय पर, सही पात्र को और उचित स्थान पर दिया गया दान ही वास्तविक दान है। यह अहंकार को मिटाने का एक माध्यम है।

तप का अर्थ कष्ट सहना नहीं, बल्कि 'इंद्रिय निग्रह' है। अपने मन और इंद्रियों को व्यर्थ के विषयों से हटाकर लक्ष्य की ओर केंद्रित करना ही तप है। यह आत्म-अनुशासन की प्रक्रिया है।

ये कर्म 'पावन' हैं, यानी ये चित्त को शुद्ध करते हैं। शुद्ध चित्त में ही ज्ञान का उदय होता है और ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। अतः ये मोक्ष के लिए आधार तैयार करते हैं।

कर्म करते समय फल की चिंता छोड़ देना और यह भाव रखना कि "मैं जो भी कर रहा हूँ, वह ईश्वर की सेवा है", आसक्ति रहित कर्म करने का सबसे सरल मार्ग है। इसे ही 'निष्काम कर्मयोग' कहा जाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

यज्ञ, दान और तप के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि उन्हें करना ही चाहिए। क्योंकि ये बुद्धिमानों को भी पवित्र करने वाले हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

शुभ कर्मों का त्याग न करके उन्हें निष्काम भाव से करना चाहिए। ऐसे कर्म हमारी बुद्धि को शुद्ध कर मोक्ष के मार्ग पर ले जाते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/78 6% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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