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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 5

अध्याय 18 · श्लोक 5

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५॥

yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṃ kāryam eva tat | yajño dānaṃ tapaś caiva pāvanāni manīṣiṇām ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यज्ञ-दान-तपः-कर्म: actions of sacrifice, charity, and austerity; न: not; त्याज्यम्: to be abandoned; कार्यम्: must be performed; एव: indeed; तत्: that; यज्ञः: sacrifice; दानम्: charity; तपः: austerity; च: and; एव: also; पावनानि: purifying; मनीषिणाम्: for the wise.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यज्ञ, दान और तप - ये कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि करने ही योग्य हैं। यज्ञ, दान और तप विद्वान् पुरुषों को भी पवित्र करने वाले हैं।

English Translation

Acts of sacrifice, charity, and austerity should not be abandoned; they must certainly be performed. Sacrifice, charity, and austerity are purifying for the wise.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् स्पष्ट करते हैं कि यज्ञ, दान, तप जैसे नित्य कर्म त्याज्य नहीं हैं। ये तो साधक को पवित्र करते हैं। इसलिए इन्हें करना चाहिए, पर फल की आसक्ति रहित होकर।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।