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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 3

अध्याय 18 · श्लोक 3

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३॥

tyājyaṃ doṣavad ity eke karma prāhur manīṣiṇaḥ | yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyam iti cāpare ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

त्याज्यम्: ought to be abandoned; दोषवत्: as evil; इति: thus; एके: some; कर्म: action; प्राहुः: declare; मनीषिणः: thinkers; यज्ञ-दान-तपः-कर्म: actions of sacrifice, charity, and austerity; न: not; त्याज्यम्: to be abandoned; इति: thus; च: and; अपरे: others.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कुछ विद्वान् कहते हैं कि सब कर्म दोषयुक्त होने से त्याग करने योग्य हैं, और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप ये कर्म त्याग करने योग्य नहीं हैं।

English Translation

Some wise men declare that all actions are to be abandoned as evil; while others say that acts of sacrifice, charity, and austerity should not be abandoned.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यहाँ दो मतों का उल्लेख है। एक मत कर्मों को पूर्णतया त्यागने का है, दूसरा यज्ञ, दान, तप जैसे शुभ कर्मों को न त्यागने का। यह विवाद अर्जुन की शंका का कारण है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।