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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 10

अध्याय 18 · श्लोक 10

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥

na dveṣṭy akuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate | tyāgī sattva-samāviṣṭo medhāvī chinna-saṃśayaḥ ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: not; द्वेष्टि: hates; अकुशलम्: unfavourable; कर्म: action; कुशले: in favourable; न: not; अनुषज्जते: is attached; त्यागी: the renouncer; सत्त्व-समाविष्टः: imbued with sattva; मेधावी: intelligent; छिन्न-संशयः: one whose doubts are cut.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो त्यागी सत्त्वगुण से युक्त, मेधावी और संशयरहित है, वह अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता।

English Translation

The renouncer, imbued with the mode of goodness, intelligent, and with doubts cut, does not hate unfavourable actions nor is attached to favourable ones.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सात्त्विक त्यागी का स्वरूप: वह कर्मों के प्रति राग-द्वेष से मुक्त होता है। वह जानता है कि कर्म तो करने हैं, पर उनके प्रति आसक्ति नहीं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।