श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 10

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 38 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
न
not
द्वेष्टि
hates
अकुशलम्
unfavourable
कर्म
action
कुशले
in favourable
न
not
अनुषज्जते
is attached
त्यागी
the renouncer
सत्त्व-समाविष्टः
imbued with sattva
मेधावी
intelligent
छिन्न-संशयः
one whose doubts are cut.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो त्यागी सत्त्वगुण से युक्त, मेधावी और संशयरहित है, वह अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च मुकुटमणि के समान है। यह ग्रंथ केवल युद्ध के मैदान में अर्जुन को दिया गया उपदेश मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव मात्र के लिए जीवन जीने की कला, मानसिक शांति, कर्म योग और मोक्ष का एक ऐसा अकाट्य मार्गदर्शक दस्तावेज है जो हर युग में प्रासंगिक रहा है। भगवद्गीता के अठारह अध्याय मानव चेतना के विभिन्न स्तरों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं। इसी शृंखला में, मोक्षसंन्यास योग नामक अठारहवें अध्याय का यह दसवां श्लोक—"न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥"—एक सात्त्विक, ज्ञानी और उन्नत पुरुष (त्यागी) के आंतरिक एवं बाहरी चरित्र का अत्यंत सजीव और दार्शनिक चित्र प्रस्तुत करता है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि वास्तविक 'त्यागी' या संन्यासी कौन है। सामान्य जन की दृष्टि में त्याग का अर्थ घर-बार छोड़ना, वल्कल वस्त्र पहनना या कर्मों से पूरी तरह विमुख हो जाना होता है। परंतु, गीता का यह श्लोक इस मिथक को पूरी तरह खंडित करता है। भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सच्चा त्यागी वह है जो न तो किसी अप्रिय या प्रतिकूल कर्म से द्वेष करता है, और न ही किसी अनुकूल या सुखद कर्म में अत्यधिक आसक्त होता है। उसके भीतर सात्त्विक गुणों की प्रधानता होती है, वह प्रज्ञावान (मेधावी) होता है और उसके समस्त संशय सदा के लिए छिन्न-भिन्न हो चुके होते हैं।

भक्तिकाल से लेकर आधुनिक युग तक, संतों और दार्शनिकों ने इस श्लोक को कर्मयोग की पराकाष्ठा माना है। जब मनुष्य अपने दैनिक जीवन में राग और द्वेष के द्वंद्व से ऊपर उठकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है, तब उसका अंतःकरण शुद्ध हो जाता है। यह श्लोक आधुनिक तनावपूर्ण जीवनशैली में मानसिक संतुलन बनाए रखने का अचूक औषध है। इस लेख में हम इसी श्लोक के शाब्दिक अर्थ, व्याकरण, पौराणिक संदर्भ, और इसके नियमित चिंतन से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभों का अत्यंत गहराई से अध्ययन करेंगे ताकि साधक इसे अपने जीवन में उतारकर परम शांति को प्राप्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं सस्वर पाठ विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अठारहवें अध्याय (मोक्षसंन्यासयोग) का श्लोक १० ॥

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥ १०॥

संस्कृत पदच्छेद: न द्वेष्टि अकुशलम् कर्म कुशले न अनुषज्जते। त्यागी सत्त्व-समाविष्टः मेधावी छिन्न-संशयः॥

सस्वर पाठ की विधि एवं नियम: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नान के पश्चात पवित्र मन से करना चाहिए। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'न द्वेष्ट्यकुशलम्' बोलते समय 'द्वेष्टि' पर हल्का बल दें और 'छिन्नसंशयः' का उच्चारण विसर्ग के साथ स्पष्ट करें। इसका नियमित तीन बार या ग्यारह बार सस्वर पाठ करने से बुद्धि में सात्त्विक प्रकाश का उदय होता है और कर्मों के प्रति आसक्ति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

यहाँ श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका विस्तृत आध्यात्मिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न नहीं निषेधवाचक पद, जो राग-द्वेष की अनुपस्थिति को दर्शाता है।
द्वेष्टि द्वेष करता है, घृणा करता है प्रतिकूल या कष्टदायक परिस्थितियों के प्रति मन में उत्पन्न होने वाली वितृष्णा का अभाव।
अकुशलम् अशुभ, कष्टदायक या अप्रिय ऐसे कर्म जो मनुष्य को प्रिय नहीं लगते या समाज में जिन्हें निम्न कोटि का माना जाता है।
कर्म क्रिया, कर्तव्य, कार्य प्रकृति और समाज द्वारा निर्धारित दायित्व जिनका पालन करना अनिवार्य है।
कुशले शुभ, अनुकूल या प्रिय कर्म में सुखद परिणाम देने वाले, अनुकूल और पुण्यदायक कार्य।
न अनुषज्जते आसक्त नहीं होता, लिप्त नहीं होता सुखद अनुभवों या कार्यों के प्रति मोह या पकड़ न रखना।
त्यागी वास्तविक त्यागी, संन्यासी पुरुष वह व्यक्ति जिसने आंतरिक रूप से कर्तापन के अहंकार और फल की इच्छा का त्याग कर दिया है।
सत्त्व-समाविष्टः सत्त्व गुण से युक्त जिसका अंतःकरण प्रकाशमय, पवित्र, शांत और निर्मल गुणों से परिपूर्ण हो।
मेधावी प्रज्ञावान, तीक्ष्ण बुद्धि वाला, ज्ञानी जो सत और असत, नित्य और अनित्य का भेद भली-भांति जानता है।
छिन्न-संशयः जिसके सभी संशय नष्ट हो चुके हैं माया, भ्रम और अज्ञान के बादलों से मुक्त होकर आत्मतत्व को जानने वाला।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय का यह प्रसंग महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है, जब कुरुक्षेत्र के युद्ध के ठीक आरंभ में अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को सामने देखकर अत्यंत विषादग्रस्त हो जाते हैं। वे गाण्डीव धनुष नीचे रख देते हैं और युद्ध से विरत होने की इच्छा प्रकट करते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन के परम सत्य का बोध कराने के लिए योग, ज्ञान, भक्ति और कर्म का विस्तृत उपदेश देते हैं। संपूर्ण गीता का यह अठारहवां अध्याय ('मोक्षसंन्यासयोग') समस्त अध्यायों का उपसंहार और सार है। इसमें अर्जुन ने संन्यास और त्याग के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करने का आग्रह किया था।

शास्त्रों और पुराणों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की और इसमें श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद के माध्यम से मानव जाति के सबसे बड़े संशयों का निवारण किया। प्राचीन काल में जब महर्षि शुकदेव या राजा परीक्षित जैसे महान पात्रों ने आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए संन्यास के मार्ग पर विचार किया, तो उन्हें भी इसी प्रकार के उपदेशों का सहारा लेना पड़ा।

इस विशेष श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित इस अमर ग्रंथ में यह स्थापित करते हैं कि संन्यास कोई बाह्य वेशभूषा या पलायनवाद नहीं है। पौराणिक कथाओं और उपनिषदों के आख्यानों (जैसे जनक और याज्ञवल्क्य का संवाद) में भी इस बात की पुष्टि होती है कि राजा जनक जैसे महाज्ञानी राजर्षि महलों में रहते हुए भी पूर्ण रूप से 'त्यागी' और 'छिन्नसंशय' थे क्योंकि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन तो करते थे, किंतु उनके फल में कभी आसक्त नहीं होते थे। इसी शास्त्रीय परंपरा को यह श्लोक अत्यंत सरल किंतु गहन शब्दों में परिभाषित करता है, जिससे हर युग का साधक प्रेरित होता रहा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस दसवें श्लोक का प्रतिदिन मनन, चिंतन और जप करने से साधक के जीवन में निम्नलिखित चमत्कारी और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

अप्रिय कर्मों से द्वेष न करने और प्रिय कर्मों में आसक्ति न रखने का भाव विकसित होने से मन के उतार-चढ़ाव शांत हो जाते हैं और मानसिक संतुलन बना रहता है।

2. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

जब मनुष्य बिना किसी राग-द्वेष के अपने कर्तव्यों का पालन करता है, तो नए कर्मबंधनों का निर्माण रुक जाता है और संचित कर्मों का क्षय होने लगता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा का संचार

'सत्त्वसमाविष्टः' होने के कारण साधक के भीतर सात्त्विक ऊर्जा बढ़ती है, जिससे उसका पूरा आवरण और औरा (Aura) सकारात्मकता से भर जाता है।

4. संशयों का शमन

'छिन्नसंशयः' स्थिति प्राप्त होने से जीवन के हर मोड़ पर निर्णय लेने की क्षमता तीव्र होती है और असमंजस या भ्रम की स्थिति हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है।

5. तनाव और अवसाद से मुक्ति

परिणामों की चिंता और असफलता का भय समाप्त होने के कारण आधुनिक जीवनशैली से जुड़ा अत्यधिक तनाव और डिप्रेशन छू मंतर हो जाता है।

6. मेधा और बुद्धि का विकास

नियमित रूप से इस श्लोक का पाठ करने से बुद्धि सूक्ष्म और तीक्ष्ण (मेधावी) होती है, जिससे उच्च कोटि के ज्ञान को ग्रहण करने में आसानी होती है।

7. अनासक्त जीवन शैली का अर्जन

व्यक्ति परिवार और समाज में रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह जल से अछूता रहकर जीवन व्यतीत करना सीख जाता है, जो असली योग है।

8. भगवत कृपा एवं मोक्ष प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रिय उपदेश को आचरण में उतारने से साधक को भगवद्कृपा की प्राप्ति होती है और वह अंततः भवसागर से तर जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह लेख हमारे वरिष्ठ वैदिक विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन संस्कृति के शोधकर्ताओं की देखरेख में तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत समस्त व्याख्याएं श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञानानन्द जी महाराज के दृष्टिकोण) पर आधारित हैं।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: इस आलेख को तैयार करते समय व्याकरण की शुद्धता, शब्दों के मूल संस्कृत अर्थ और उनके दार्शनिक निहितार्थों की गहन जांच की गई है ताकि पाठकों तक सनातन धर्म का त्रुटिहीन और उच्च कोटि का ज्ञान पहुंच सके। हमारा उद्देश्य आधुनिक पीढ़ी को वेदों और उपनिषदों के शाश्वत सत्यों से जोड़ना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'अकुशल कर्म' से तात्पर्य उन कार्यों से है जो सामाजिक, नैतिक या धार्मिक दृष्टिकोणा से अप्रिय, कष्टदायक या निम्न कोटि के माने जाते हैं, जिन्हें मनुष्य करना नहीं चाहता। एक सात्त्विक त्यागी ऐसे कार्यों के मिलने पर भी उनसे द्वेष या घृणा नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने प्रारब्ध का हिस्सा मानकर शांति से पूर्ण करता है।

साधारण मनुष्य अनुकूल कर्म मिलने पर उनमें अत्यधिक आसक्त हो जाता है और प्रतिकूल कर्म मिलने पर द्वेष व क्रोध करने लगता है। इसके विपरीत, वास्तविक त्यागी (जो सत्त्वगुण से समाविष्ट होता है) सुखद कार्यों में मोह नहीं रखता और दुःखद कार्यों से द्वेष नहीं करता; वह दोनों अवस्थाओं में समान रूप से स्थित रहता है।

'मेधावी' वह है जिसकी बुद्धि सूक्ष्म और तीक्ष्ण होती है, जो धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य का भेद तुरंत समझ जाता है। 'छिन्नसंशय' वह है जिसके मन में जीवन, मृत्यु, कर्म और ईश्वर को लेकर कोई भी दुविधा या संशय शेष नहीं रहता। ये दोनों विशेषण एक ज्ञानी और परिपक्व आत्मानुभूति वाले पुरुष की पहचान हैं।

निश्चित रूप से। आधुनिक जीवन का अधिकांश तनाव परिणामों की चिंता (आसक्ति) और मनचाही परिस्थिति न मिलने पर होने वाले द्वेष से उत्पन्न होता है। इस श्लोक के दर्शन को जीवन में उतारने से व्यक्ति काम के बोझ और परिणामों के तनाव से मुक्त हो जाता है, जिससे मानसिक शांति प्राप्त होती है।

अठारहवां अध्याय 'मोक्षसंन्यासयोग' गीता का अंतिम और सबसे व्यापक अध्याय है। इसमें त्याग (संन्यास) और कर्म के विभिन्न स्वरूपों का वर्गीकरण किया गया है। यह श्लोक सात्त्विक त्याग की सटीक परिभाषा देता है, जो इस अध्याय के मुख्य विषयों में से एक है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो त्यागी सत्त्वगुण से परिपूर्ण, बुद्धिमान और संशयरहित है, वह अशुभ कर्म से द्वेष नहीं करता और शुभ कर्म में आसक्त नहीं होता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सच्चा संन्यासी कर्मों के प्रति तटस्थ रहता है। वह समझता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, आत्मा अकर्ता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/78 13% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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