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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 18

अध्याय 17 · श्लोक 18

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥

satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena caiva yat | kriyate tad iha proktaṁ rājasaṁ calam adhruvam ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सत्कार: hospitality; मान: honor; पूजार्थम्: for the sake of worship/reverence; तप: austerity; दम्भेन: with hypocrisy; च: and; एव: indeed; यत्: which; क्रियते: is performed; तत्: that; इह: here; प्रोक्तम्: declared; राजसम्: rajasic; चलम्: temporary; अध्रुवम्: unstable.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए तथा दम्भ (पाखंड) से किया जाता है – वह राजस कहा गया है, जो चंचल (थोड़े समय का) और अनित्य है।

English Translation

That austerity which is performed for the sake of gaining honor, respect, and reverence, and with hypocrisy – that is here declared rajasic, temporary and unstable.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस तप वह है जो लोक-प्रतिष्ठा, सम्मान, या पूजा पाने के लिए किया जाता है और इसमें दम्भ (दिखावा) होता है। ऐसा तप न तो स्थिर होता है और न ही दीर्घकालिक लाभ देता है। Rajasic austerity is performed for the sake of receiving honor, respect, and adoration, and it is accompanied by pride and hypocrisy. It is unstable and yields only temporary results.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।