श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 9

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 24 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: | प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || ९||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
एताम्
इस
दृष्टिम्
दृष्टि को
अवष्टभ्य
आश्रय लेकर
नष्टात्मान
आत्मा से गिरे हुए
अल्पबुद्धय
अल्पबुद्धि वाले
प्रभवन्ति
प्रकट होते हैं
उग्रकर्माण
क्रूर कर्म करने वाले
क्षयाय
नाश के लिए
जगत
जगत् का
अहिता
अहितकारी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस दृष्टिकोण को धारण करके वे नष्ट हुई आत्मा वाले अल्पबुद्धि लोग उग्र कर्म करने वाले, जगत् के अहितकारी और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का यह नवम श्लोक मानव चेतना के उस अंधकारमय पक्ष को उजागर करता है, जहाँ बुद्धि का प्रकाश क्षीण हो जाता है और अहंकार का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उन 'आसुरी प्रवृत्तियों' के बारे में सचेत कर रहे हैं, जो न केवल व्यक्ति के स्वयं के पतन का कारण बनती हैं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए विनाशकारी सिद्ध होती हैं। जब मनुष्य अपनी दृष्टि को केवल भौतिकता, स्वार्थ और नास्तिकता के संकुचित दायरे में सीमित कर लेता है, तो वह 'नष्टात्मा' बन जाता है। यहाँ 'नष्टात्मा' का अर्थ है—अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को विस्मृत कर देना।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें आत्म-अवलोकन (Self-introspection) की प्रेरणा देता है। ब्रह्मांड एक व्यवस्थित तंत्र है, जो 'ऋत' (Cosmic Order) पर आधारित है। जब कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को नकार कर केवल अपनी इंद्रिय-तृप्ति को ही परम लक्ष्य मान लेता है, तो वह 'उग्रकर्मा' बन जाता है। ऐसे कर्म, जो हिंसा, द्वेष और स्वार्थ से प्रेरित हों, वे समाज में असंतुलन पैदा करते हैं। यह श्लोक केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक दार्शनिक दर्पण है, जिसमें हम अपने विचारों की शुद्धता की जांच कर सकते हैं। सनातन धर्म में 'दैवी' और 'आसुरी' संपदा का विभाजन इसी उद्देश्य से किया गया है ताकि साधक अपनी प्रवृत्तियों को पहचान कर उन्हें सात्विकता की ओर मोड़ सके। इस श्लोक का चिंतन हमें यह बोध कराता है कि हमारी दृष्टि ही हमारी सृष्टि का निर्माण करती है। यदि दृष्टि में दिव्यता है, तो जीवन में शांति है; यदि दृष्टि में आसुरी मोह है, तो जीवन में केवल संघर्ष और विनाश ही शेष रहता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: ॥ ९ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर के उच्चारण पर ध्यान दें। 'एतां' में दीर्घ स्वर का ध्यान रखें। 'नष्टात्मानो' में विसर्ग का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए। 'उग्रकर्माण:' में 'र' का रेफ और विसर्ग का उचित घोष करें। इसे प्रतिदिन गीता के षोडश अध्याय के पाठ के साथ श्रद्धापूर्वक पढ़ना चाहिए।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि किस प्रकार गलत धारणाएं (Wrong Perceptions) मनुष्य की बुद्धि को कुंठित कर देती हैं। जब हम इस श्लोक का पाठ करते हैं, तो हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी बुद्धि को शास्त्र-सम्मत और सात्विक विचारों से जोड़ेंगे। यह श्लोक न केवल एक चेतावनी है, बल्कि आत्म-सुधार का एक सशक्त माध्यम भी है। जो साधक इस श्लोक के अर्थ को अपने जीवन में उतारता है, वह आसुरी प्रवृत्तियों के प्रभाव से मुक्त होकर दैवी गुणों की ओर अग्रसर होने लगता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
एतांइसउस आसुरी दृष्टि की ओर संकेत।
दृष्टिमदृष्टि/मान्यतासंसार को देखने का नास्तिक दृष्टिकोण।
अवष्टभ्यपकड़कर/आश्रय लेकरगलत मान्यताओं को सत्य मान लेना।
नष्टात्मान:नष्ट आत्मा वालेस्वयं के वास्तविक स्वरूप से विमुख।
अल्पबुद्धय:कम बुद्धि वालेजिनकी बुद्धि केवल भौतिकता तक सीमित है।
प्रभवन्तिउत्पन्न होते हैंऐसी प्रवृत्तियों का उदय होना।
उग्रकर्माण:भयंकर कर्म करने वालेहिंसक और विनाशकारी कार्य।
क्षयायविनाश के लिएसंसार के पतन का कारण।
जगत:संसार केसमस्त चराचर जगत के लिए।
अहिता:अहितकारीजो कल्याण के विरोधी हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय का नाम 'दैवासुर-संपद विभाग योग' है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का विस्तृत वर्णन किया है। यह श्लोक उस संदर्भ में आता है जहाँ भगवान उन लोगों की मानसिकता का चित्रण कर रहे हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं और यह मानते हैं कि यह संसार केवल काम-वासना और संयोग का परिणाम है।

पौराणिक संदर्भों में, हम हिरण्यकशिपु, रावण और दुर्योधन जैसे पात्रों को देखते हैं, जिन्होंने इसी 'आसुरी दृष्टि' को अपना लिया था। रावण, जो वेदों का ज्ञाता होने के बावजूद अपनी 'अल्पबुद्धि' और अहंकार के कारण 'नष्टात्मा' बन गया था, उसने अपनी शक्ति का उपयोग 'उग्रकर्मों' के लिए किया, जिससे अंततः उसका और उसके कुल का विनाश हुआ। महाभारत के युद्ध में दुर्योधन का चरित्र भी इसी श्लोक का जीवंत उदाहरण है। उसने धर्म को जानते हुए भी उसे त्याग दिया और केवल अपनी आसुरी महत्वाकांक्षाओं को ही सर्वोपरि रखा।

वेदों में 'ऋत' (Cosmic Law) की अवधारणा है। जब मनुष्य इस 'ऋत' के विरुद्ध कार्य करता है, तो वह 'अहित' का मार्ग चुनता है। यह श्लोक हमें यह स्मरण दिलाता है कि मनुष्य की बुद्धि जब तक परमात्मा के प्रति समर्पित नहीं होती, तब तक वह केवल विनाशकारी ही सिद्ध होती है। यह शिक्षा हमें उपनिषदों के उस ज्ञान से जोड़ती है जहाँ 'श्रेय' (कल्याणकारी) और 'प्रेय' (प्रिय लगने वाला) के बीच भेद करना सिखाया गया है। जो लोग 'प्रेय' के पीछे भागते हैं, वे अंततः 'नष्टात्मा' की श्रेणी में आ जाते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • बुद्धि की शुद्धि: इस श्लोक के चिंतन से कुतर्क करने वाली बुद्धि का शमन होता है और विवेक का उदय होता है।
  • आसुरी प्रवृत्तियों का नाश: क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे आसुरी गुणों को पहचानने और उन्हें त्यागने में सहायता मिलती है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): नियमित पाठ से मन में सात्विक विचारों का संचार होता है, जिससे व्यक्तित्व में ओज और तेज की वृद्धि होती है।
  • कर्मों में संतुलन: व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति सचेत हो जाता है और 'उग्रकर्मों' से बचकर लोक-कल्याणकारी कार्यों की ओर प्रवृत्त होता है।
  • मानसिक शांति: नास्तिकता और संशय से उत्पन्न मानसिक अशांति दूर होती है और ईश्वर के प्रति विश्वास दृढ़ होता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: यह श्लोक हमें यह याद दिलाता है कि हम शरीर नहीं, आत्मा हैं, जिससे आत्म-ज्ञान की प्राप्ति सुगम होती है।
  • पारिवारिक और सामाजिक सद्भाव: जब व्यक्ति स्वयं के अहंकार को त्यागता है, तो उसके संबंधों में मधुरता और शांति आती है।
  • दैवी कृपा: शास्त्र-सम्मत जीवन जीने से साधक पर भगवान की विशेष कृपा दृष्टि बनी रहती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के षोडश अध्याय, श्लोक 9 पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर और अन्य प्रामाणिक भाष्यकारों के दार्शनिक दृष्टिकोणों का समावेश किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल और बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अवैज्ञानिक दावों से मुक्त है और पूर्णतः शास्त्र-आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नष्टात्मा का अर्थ है वह व्यक्ति जिसने अपनी आत्मा की अमरता और दिव्यता को भुला दिया है। जो केवल भौतिक शरीर को ही सब कुछ मानता है, वह अपनी आध्यात्मिक चेतना को नष्ट कर लेता है।

अल्पबुद्धि वह है जो क्षणिक सुखों के लिए शाश्वत सत्य को त्याग देता है। जिसकी बुद्धि केवल स्वार्थ और इंद्रिय-भोग तक सीमित है, उसे ही अल्पबुद्धि कहा गया है।

उग्रकर्मों से बचने का एकमात्र उपाय है—'निष्काम कर्मयोग'। जब हम अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देते हैं, तो उनमें हिंसा और स्वार्थ का भाव स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

नहीं, यह श्लोक प्रत्येक साधक के लिए है। कभी-कभी आस्तिक होने का दावा करने वाले भी अपने कर्मों में आसुरी प्रवृत्तियों को अपना लेते हैं। यह श्लोक हमें निरंतर आत्म-निरीक्षण की प्रेरणा देता है।

दैनिक जीवन में, जब भी हम क्रोध, ईर्ष्या या स्वार्थ से प्रेरित हों, तो इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए। यह हमें तुरंत सचेत करता है कि हमारा यह व्यवहार हमारे और समाज के लिए विनाशकारी हो सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस आसुरी दृष्टिकोण को आश्रय देकर, आत्मा से पतित, अल्पबुद्धि वाले लोग क्रूर कर्म करने वाले, जगत् का अहित करने वाले और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गलत दर्शन मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। सही ज्ञान और सद्बुद्धि ही कल्याणकारी है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 9 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 9/24 38% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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