दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 9
श्लोक ९ में कहा गया कि आसुरी दृष्टि वाले लोग आत्महीन, अल्पबुद्धि, क्रूरकर्मी और जगत् के नाशक होते हैं।
संस्कृत श्लोक
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: | प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || ९||
etāṃ dṛṣṭim avaṣṭabhya naṣṭātmāno 'lpa-buddhayaḥ | prabhavanty ugra-karmāṇaḥ kṣayāya jagato 'hitāḥ ||9||
पदच्छेद / शब्दार्थ
एताम्: इस; दृष्टिम्: दृष्टि को; अवष्टभ्य: आश्रय लेकर; नष्टात्मान: आत्मा से गिरे हुए; अल्पबुद्धय: अल्पबुद्धि वाले; प्रभवन्ति: प्रकट होते हैं; उग्रकर्माण: क्रूर कर्म करने वाले; क्षयाय: नाश के लिए; जगत: जगत् का; अहिता: अहितकारी।
हिंदी अनुवाद
इस दृष्टिकोण को धारण करके वे नष्ट हुई आत्मा वाले अल्पबुद्धि लोग उग्र कर्म करने वाले, जगत् के अहितकारी और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।
English Translation
Holding this view, these ruined souls of small intelligence and cruel deeds arise as enemies of the world, for its destruction.
टीका / Commentary
जो लोग ऐसी नास्तिक मान्यता रखते हैं, वे आत्मिक रूप से पतित हो जाते हैं। उनकी बुद्धि अल्प होती है और वे संसार के लिए हानिकारक कर्म करते हैं।