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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 9

अध्याय 16 · श्लोक 9

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: | प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || ९||

etāṃ dṛṣṭim avaṣṭabhya naṣṭātmāno 'lpa-buddhayaḥ | prabhavanty ugra-karmāṇaḥ kṣayāya jagato 'hitāḥ ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

एताम्: इस; दृष्टिम्: दृष्टि को; अवष्टभ्य: आश्रय लेकर; नष्टात्मान: आत्मा से गिरे हुए; अल्पबुद्धय: अल्पबुद्धि वाले; प्रभवन्ति: प्रकट होते हैं; उग्रकर्माण: क्रूर कर्म करने वाले; क्षयाय: नाश के लिए; जगत: जगत् का; अहिता: अहितकारी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस दृष्टिकोण को धारण करके वे नष्ट हुई आत्मा वाले अल्पबुद्धि लोग उग्र कर्म करने वाले, जगत् के अहितकारी और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।

English Translation

Holding this view, these ruined souls of small intelligence and cruel deeds arise as enemies of the world, for its destruction.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जो लोग ऐसी नास्तिक मान्यता रखते हैं, वे आत्मिक रूप से पतित हो जाते हैं। उनकी बुद्धि अल्प होती है और वे संसार के लिए हानिकारक कर्म करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।