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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 10

अध्याय 16 · श्लोक 10

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || १०||

kāmam āśritya duṣpūraṃ dambha-māna-madānvitāḥ | mohād gṛhītvāsad-grāhān pravartante 'śuci-vratāḥ ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कामम्: कामना को; आश्रित्य: आश्रय लेकर; दुष्पूरम्: जो कभी नहीं भरती; दम्भमानमदान्विता: दम्भ, मान और मद से युक्त; मोहात्: मोह से; गृहीत्वा: ग्रहण करके; असद्ग्राहान्: असत्य को; प्रवर्तन्ते: बर्तते हैं; अशुचिव्रता: अपवित्र व्रत वाले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

दुष्पूर कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य को ग्रहण करके वे अपवित्र व्रतों का पालन करने वाले होते हैं।

English Translation

Giving themselves up to insatiable lust, full of hypocrisy, pride and intoxication, they accept false doctrines and live impure lives.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग अतृप्त कामनाओं के वशीभूत होते हैं। वे दम्भी, अभिमानी और मदांध होते हैं। वे मोहवश असत्य सिद्धान्तों को पकड़ लेते हैं और अपवित्र आचरण करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।