श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 10

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 24 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || १०||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
कामम्
कामना को
आश्रित्य
आश्रय लेकर
दुष्पूरम्
जो कभी नहीं भरती
दम्भमानमदान्विता
दम्भ, मान और मद से युक्त
मोहात्
मोह से
गृहीत्वा
ग्रहण करके
असद्ग्राहान्
असत्य को
प्रवर्तन्ते
बर्तते हैं
अशुचिव्रता
अपवित्र व्रत वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

दुष्पूर कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य को ग्रहण करके वे अपवित्र व्रतों का पालन करने वाले होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का सोलहवां अध्याय 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय मानव चेतना के दो ध्रुवों—दैवी संपदा और आसुरी संपदा—का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। प्रस्तुत श्लोक (16.10) आसुरी प्रवृत्तियों वाले मनुष्यों की मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक स्थिति का एक सटीक चित्रण है। ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से, मनुष्य का जीवन गुणों का एक संगम है। जब व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रकाश (दैवी गुणों) को भूलकर भौतिक इच्छाओं के अंधकार में खो जाता है, तब वह 'आसुरी' मार्ग पर अग्रसर होता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें आत्म-अवलोकन (Self-introspection) का अवसर प्रदान करता है। काम (अतृप्त इच्छाएं), दम्भ (पाखंड), मान (अहंकार), और मद (नशा) ये चार स्तंभ उस कारागार के हैं, जिसमें आत्मा स्वयं को कैद कर लेती है। जब कोई व्यक्ति मोहवश असत्य सिद्धांतों को अपना लेता है, तो उसकी बुद्धि मलिन हो जाती है, जिससे उसका आचरण अपवित्र (अशुचि) हो जाता है। यह श्लोक केवल एक चेतावनी नहीं है, बल्कि एक दर्पण है जो हमें यह दिखाता है कि कैसे 'अविद्या' के कारण हम अपने वास्तविक स्वरूप से दूर हो जाते हैं। इस श्लोक का अध्ययन और मनन हमें उन मानसिक बंधनों को पहचानने में मदद करता है जो हमें मोक्ष के मार्ग से विचलित करते हैं। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का दास है, वह कभी भी शांति और आनंद का अनुभव नहीं कर सकता। अतः, इस श्लोक का महत्व हमारे दैनिक जीवन के आचरण को शुद्ध करने और विवेक को जागृत करने में निहित है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: |
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || १०||

श्लोकोच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर के उच्चारण पर ध्यान देना आवश्यक है। 'काममाश्रित्य' में दीर्घ स्वरों का ध्यान रखें। 'दुष्पूरं' शब्द में 'ष' का उच्चारण मूर्धन्य होना चाहिए। यह श्लोक आसुरी स्वभाव के व्यक्तियों की मानसिक स्थिति का वर्णन करता है, अतः इसे पढ़ते समय मन में वैराग्य और विवेक का भाव रखना चाहिए। इसे प्रतिदिन गीता के 16वें अध्याय के साथ पढ़ने से व्यक्ति में आत्म-नियंत्रण की शक्ति बढ़ती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कामम्कामनाएं/इच्छाएंअतृप्त भौतिक वासनाएं जो कभी शांत नहीं होतीं।
आश्रित्यआश्रय लेकरइच्छाओं को ही अपना जीवन का आधार मान लेना।
दुष्पूरम्कठिनाई से पूर्ण होने वालीइच्छाओं का सागर कभी नहीं भरता, यह अंतहीन है।
दम्भपाखंड/दिखावाबाहरी धर्म का ढोंग करना, आंतरिक शुद्धि का अभाव।
मानअभिमान/अहंकारस्वयं को श्रेष्ठ मानने का मिथ्या भाव।
मदमद/नशाशक्ति या धन के अहंकार में विवेक खो देना।
मोहात्मोह के कारणअज्ञानता के वशीभूत होकर सत्य को न देख पाना।
असद्ग्राहान्गलत सिद्धांतों कोअधर्म को ही धर्म मानकर उसे पकड़ लेना।
अशुचिव्रता:अपवित्र आचरणअनैतिक कार्यों को ही अपना व्रत/नियम बना लेना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'दैवी' और 'आसुरी' संपदा के बीच का अंतर समझा रहे हैं। यह संवाद कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में हुआ था, जहाँ अर्जुन अपने कर्तव्यों और मोह के बीच फंसे थे। पौराणिक कथाओं में हिरण्यकश्यप, रावण और दुर्योधन जैसे पात्रों का उदाहरण दिया जाता है, जो 'दम्भ, मान और मद' के प्रतीक थे।

विशेष रूप से, दुर्योधन का चरित्र इस श्लोक का साक्षात उदाहरण है। वह 'काम' (राज्य की तृष्णा) के वशीभूत था। उसने 'असद्ग्राहान्' (अधर्म के सिद्धांतों) को अपनाया, जिसके कारण उसने पांडवों के साथ अन्याय किया। शास्त्रों में कहा गया है कि जब व्यक्ति का विवेक 'मोह' से ढंक जाता है, तब वह अपनी बुद्धि का उपयोग केवल विनाशकारी कार्यों में करता है। वेद और उपनिषद बार-बार चेतावनी देते हैं कि 'काम' (वासना) अग्नि के समान है, जिसे जितना अधिक घी (भोग) दिया जाए, वह उतनी ही अधिक प्रज्वलित होती है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आसुरी प्रवृत्ति किसी बाहरी राक्षस का नाम नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर के उन विकारों का समूह है जो हमें ईश्वर से दूर ले जाते हैं। महर्षि व्यास ने इस अध्याय के माध्यम से मानव जाति को एक चेतावनी दी है कि यदि हम अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखेंगे, तो हम 'अशुचिव्रता:' (अपवित्र आचरण) के दलदल में फंस जाएंगे। यह पृष्ठभूमि हमें यह समझने में मदद करती है कि गीता का ज्ञान केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षण में धर्म और अधर्म के बीच सही चुनाव करने के लिए है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-जागरूकता: इस श्लोक का नियमित मनन करने से व्यक्ति को अपने भीतर छिपे विकारों (दम्भ, मान, मद) का बोध होता है।
  • मानसिक शांति: इच्छाओं की अनियंत्रित दौड़ को पहचानने से मन में वैराग्य उत्पन्न होता है, जो मानसिक शांति का आधार है।
  • विवेक की वृद्धि: यह श्लोक 'असद्ग्राहान्' (गलत सिद्धांतों) को छोड़ने की प्रेरणा देता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): आसुरी प्रवृत्तियों को त्यागने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में सात्विकता का संचार होता है।
  • कर्म शुद्धि: 'अशुचिव्रता:' से बचने का संकल्प लेने से व्यक्ति के कर्मों में पवित्रता आती है।
  • अहंकार का नाश: 'मान' और 'मद' के दुष्परिणामों को जानकर व्यक्ति विनम्रता की ओर बढ़ता है।
  • दैवी संपदा का विकास: जब आसुरी गुणों का नाश होता है, तो स्वतः ही दैवी गुणों (अभय, शुद्धि, दान) का उदय होता है।
  • मोक्ष का मार्ग: गीता के इन श्लोकों का अभ्यास आत्मा को बंधन मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के 16वें अध्याय (दैवासुरसंपद्विभागयोग) के मूल संस्कृत श्लोकों पर आधारित है। इसे 'भक्तिलोक.इन' के विद्वानों द्वारा विभिन्न भाष्यकारों जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी चिन्मयानंद के दृष्टिकोणों का समन्वय करके 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत और तार्किक आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करना है। यह सामग्री पूर्णतः प्रमाणिक ग्रंथों के सिद्धांतों पर आधारित है और इसमें किसी भी प्रकार के अवैज्ञानिक दावों का समावेश नहीं किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

आसुरी स्वभाव का मुख्य लक्षण है—अतृप्त कामनाओं के पीछे भागना, अहंकार (मान), पाखंड (दम्भ) और मद में चूर होकर अधर्म को ही अपना धर्म मान लेना।

हाँ, गीता के अनुसार, विवेक और सत्संग के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने आसुरी गुणों को त्यागकर दैवी गुणों को अपना सकता है। यह निरंतर अभ्यास और वैराग्य से संभव है।

'असद्ग्राहान्' का अर्थ है उन गलत सिद्धांतों या मान्यताओं को पकड़ लेना जो धर्म के विरुद्ध हैं और जो केवल स्वार्थ की पूर्ति करते हैं।

दम्भ का अर्थ है बाहरी दिखावा (पाखंड), जबकि मान का अर्थ है स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने का अहंकार। दोनों ही आध्यात्मिक उन्नति में बाधक हैं।

यह श्लोक हमें आत्म-परीक्षण करने की शक्ति देता है। जब भी हम क्रोध, अहंकार या गलत निर्णय की ओर बढ़ें, यह श्लोक हमें रुककर अपनी स्थिति का आकलन करने की प्रेरणा देता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वे दुष्पूर (कभी न भरने वाली) कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, अभिमान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य विचारों को ग्रहण करते हैं और अपवित्र आचरण वाले हो जाते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

कामना, दम्भ और मद मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। सत्य और पवित्रता का आचरण ही श्रेयस्कर है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/24 42% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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