दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 10

श्लोक १० में बताया गया कि आसुरी लोग अतृप्त काम, दम्भ, मान, मद से युक्त होकर असत्य सिद्धान्तों का पालन करते हैं।

संस्कृत श्लोक

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || १०||

kāmam āśritya duṣpūraṃ dambha-māna-madānvitāḥ | mohād gṛhītvāsad-grāhān pravartante 'śuci-vratāḥ ||10||

पदच्छेद / शब्दार्थ

कामम्: कामना को; आश्रित्य: आश्रय लेकर; दुष्पूरम्: जो कभी नहीं भरती; दम्भमानमदान्विता: दम्भ, मान और मद से युक्त; मोहात्: मोह से; गृहीत्वा: ग्रहण करके; असद्ग्राहान्: असत्य को; प्रवर्तन्ते: बर्तते हैं; अशुचिव्रता: अपवित्र व्रत वाले।

हिंदी अनुवाद

दुष्पूर कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य को ग्रहण करके वे अपवित्र व्रतों का पालन करने वाले होते हैं।

English Translation

Giving themselves up to insatiable lust, full of hypocrisy, pride and intoxication, they accept false doctrines and live impure lives.

टीका / Commentary

आसुरी लोग अतृप्त कामनाओं के वशीभूत होते हैं। वे दम्भी, अभिमानी और मदांध होते हैं। वे मोहवश असत्य सिद्धान्तों को पकड़ लेते हैं और अपवित्र आचरण करते हैं।