दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 11
श्लोक ११ में आसुरी लोगों की मानसिकता: असीम चिन्ता, भोग ही परम लक्ष्य, और यही सब है – ऐसा निश्चय।
संस्कृत श्लोक
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: || ११||
cintām aparimeyāṃ ca pralayāntām upāśritāḥ | kāmopabhoga-paramā etāvad iti niścitāḥ ||11||
पदच्छेद / शब्दार्थ
चिन्ताम्: चिन्ता को; अपरिमेयाम्: असीम; च: और; प्रलयान्ताम्: मृत्यु पर्यन्त; उपाश्रिता: आश्रित; कामोपभोगपरमा: भोग ही परम लक्ष्य; एतावत्: इतना ही; इति: ऐसा; निश्चिता: निश्चय करने वाले।
हिंदी अनुवाद
वे मृत्यु पर्यन्त रहने वाली असीम चिन्ता का आश्रय लिए रहते हैं, काम-भोग को ही परम मानते हैं और "बस यही सब कुछ है" – ऐसा निश्चय कर लेते हैं।
English Translation
They are obsessed with endless anxieties lasting until death, considering sense enjoyment as the supreme goal, and convinced that this is all.
टीका / Commentary
आसुरी लोग भोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं। वे सांसारिक चिन्ताओं में डूबे रहते हैं और मृत्यु तक उनका कोई अन्त नहीं होता।