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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 11

अध्याय 16 · श्लोक 11

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: || ११||

cintām aparimeyāṃ ca pralayāntām upāśritāḥ | kāmopabhoga-paramā etāvad iti niścitāḥ ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

चिन्ताम्: चिन्ता को; अपरिमेयाम्: असीम; च: और; प्रलयान्ताम्: मृत्यु पर्यन्त; उपाश्रिता: आश्रित; कामोपभोगपरमा: भोग ही परम लक्ष्य; एतावत्: इतना ही; इति: ऐसा; निश्चिता: निश्चय करने वाले।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वे मृत्यु पर्यन्त रहने वाली असीम चिन्ता का आश्रय लिए रहते हैं, काम-भोग को ही परम मानते हैं और "बस यही सब कुछ है" – ऐसा निश्चय कर लेते हैं।

English Translation

They are obsessed with endless anxieties lasting until death, considering sense enjoyment as the supreme goal, and convinced that this is all.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग भोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं। वे सांसारिक चिन्ताओं में डूबे रहते हैं और मृत्यु तक उनका कोई अन्त नहीं होता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।