श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 8

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 21 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् || ८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
असत्यम्
असत्य
अप्रतिष्ठम्
आधारहीन
ते
वे
जगत्
जगत्
आहु
कहते हैं
अनीश्वरम्
ईश्वररहित
अपरस्परसम्भूतम्
परस्पर संयोग से उत्पन्न
किम्
क्या
अन्यत्
अन्य
कामहैतुकम्
कामना ही जिसका कारण है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वे कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, आधारहीन है, ईश्वररहित है, और केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है – काम ही इसका कारण है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् - आध्यात्मिक विवेचना

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का आठवां श्लोक मानव चेतना के उस अंधकारमय पक्ष को उद्घाटित करता है, जिसे शास्त्र 'आसुरी वृत्ति' कहते हैं। यह श्लोक केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उन दार्शनिक भ्रांतियों का दर्पण है जो मनुष्य को ईश्वर से विमुख कर भौतिकता की अंधी दौड़ में धकेल देती हैं। जब कोई व्यक्ति यह मान लेता है कि यह जगत 'असत्य' है, इसका कोई 'आधार' (ईश्वर) नहीं है, और यह केवल 'काम' (वासना) की तृप्ति का साधन है, तो वह अपनी आत्मा के अमरत्व को विस्मृत कर देता है।

वैदिक संस्कृति में जगत को 'सत्य' माना गया है क्योंकि यह परमात्मा की अभिव्यक्ति है। इसके विपरीत, आसुरी दृष्टिकोण इसे एक आकस्मिक घटना मानता है। यह चिंतन न केवल व्यक्ति के चरित्र का पतन करता है, बल्कि समाज में अराजकता, स्वार्थ और हिंसा को जन्म देता है। इस श्लोक का अध्ययन हमें यह समझने में सहायता करता है कि कैसे नास्तिकता और भौतिकवाद का चरम रूप मनुष्य को पशुवत जीवन की ओर ले जाता है। इस विवेचना का उद्देश्य पाठकों को उस दिव्य प्रकाश की ओर ले जाना है, जहाँ वे समझ सकें कि जीवन का अर्थ केवल उपभोग नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और ईश्वरीय आज्ञा का पालन है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि यदि हम जगत के पीछे छिपे 'ईश्वर' को नहीं देख पा रहे हैं, तो हम वास्तव में सत्य से कोसों दूर हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक वर्ण का स्पष्ट उच्चारण करें। 'असत्यमप्रतिष्ठं' में 'म' और 'प्र' के संधि पर ध्यान दें। यह श्लोक दैवी और आसुरी संपदा के अंतर को समझने के लिए एक 'मंत्र' की भांति है। इसे शांत चित्त होकर, एकांत में बैठकर मनन करना चाहिए। यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि आसुरी प्रवृत्तियों का त्याग ही मोक्ष का प्रथम सोपान है। प्रतिदिन इसका पाठ करने से व्यक्ति के भीतर विवेक जागृत होता है और वह भौतिक प्रलोभनों के जाल से स्वयं को मुक्त करने का सामर्थ्य प्राप्त करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
असत्यम्असत्यजो शाश्वत नहीं है, केवल क्षणिक माया है।
अप्रतिष्ठम्आधारहीनजिसका कोई ईश्वरीय आधार या नैतिक नियम नहीं है।
जगत्संसारपरमात्मा द्वारा रचित यह विराट ब्रह्मांड।
आहुःकहते हैंआसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों का मत।
अनीश्वरम्ईश्वर रहितसृष्टि के पीछे किसी नियामक शक्ति का अभाव मानना।
अपरस्परसम्भूतम्बिना कारण केसृष्टि का संयोगवश या बिना किसी नियम के उत्पन्न होना।
किम् अन्यत्और क्याअज्ञानता के कारण उत्पन्न होने वाले प्रश्न।
कामहैतुकम्काम (वासना) ही कारणकेवल इंद्रिय सुख को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय का संदर्भ कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश से है। जब अर्जुन ने दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के बारे में जिज्ञासा प्रकट की, तब भगवान ने विस्तार से बताया कि कैसे मनुष्य अपने कर्मों और विचारों से 'आसुरी' बन जाता है। पौराणिक कथाओं में हिरण्यकश्यप और रावण जैसे पात्रों का उदाहरण दिया जाता है, जो स्वयं को ही ईश्वर मानने लगे थे और जगत को केवल अपने भोग का साधन समझते थे।

वेदों में 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) की अवधारणा है। ऋषि-मुनियों ने स्पष्ट किया है कि यह जगत एक सुव्यवस्थित तंत्र है, जिसके पीछे परमात्मा की इच्छा है। जब कोई व्यक्ति इस व्यवस्था को नकारता है, तो वह 'अनीश्वरवादी' कहलाता है। महाभारत के प्रसंग में, दुर्योधन का चरित्र इसी श्लोक का जीवंत उदाहरण है। वह मानता था कि राज्य, धन और सत्ता ही सब कुछ है और इसके लिए नैतिकता या ईश्वर की चिंता करना व्यर्थ है। यह मानसिकता ही विनाश का कारण बनती है। शास्त्रीय ग्रंथों में यह स्पष्ट किया गया है कि जो व्यक्ति जगत को 'अनीश्वर' मानता है, वह अपनी आत्मा को भी नहीं पहचान पाता। यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि यदि हम जगत को केवल 'काम' (वासना) की पूर्ति का माध्यम मानेंगे, तो हम कभी भी शांति और संतोष प्राप्त नहीं कर पाएंगे। यह शिक्षा हमें अहंकार के त्याग और ईश्वर के प्रति समर्पण की ओर ले जाती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • विवेक की जागृति: नियमित चिंतन से व्यक्ति सत्य और असत्य के बीच अंतर करने में सक्षम होता है।
  • अहंकार का नाश: यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम इस जगत के स्वामी नहीं, बल्कि एक अंश हैं।
  • मानसिक शांति: भौतिकवादी चिंताओं से मुक्ति पाकर मन में स्थिरता आती है।
  • कर्म शुद्धि: जब हम ईश्वर को जगत का आधार मानते हैं, तो हमारे कर्म स्वतः ही सात्विक हो जाते हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा: आसुरी विचारों का त्याग करने से ओज और तेज की वृद्धि होती है।
  • भय से मुक्ति: ईश्वर पर विश्वास होने से मृत्यु और अनिश्चितता का भय समाप्त हो जाता है।
  • नैतिक उत्थान: समाज में धर्म और मर्यादा का पालन करने की प्रेरणा मिलती है।
  • दैवी संपदा की प्राप्ति: आसुरी प्रवृत्तियों के हटने से दैवी गुणों (दया, क्षमा, दान) का उदय होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के सोलहवें अध्याय (दैवासुरसंपद्विभागयोग) के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। इसमें प्रयुक्त अर्थ और व्याख्याएं आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और अन्य वैदिक विद्वानों के भाष्य से प्रेरित हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है ताकि वे अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नास्तिकता यदि केवल ईश्वर के प्रति अविश्वास है, तो वह एक बौद्धिक अवस्था हो सकती है। परंतु, जब यह नास्तिकता जगत को 'काम' (वासना) का साधन मानकर अनैतिकता को जन्म देती है, तब वह 'आसुरी' कहलाती है।

यहाँ 'असत्य' का अर्थ है कि यह जगत शाश्वत नहीं है। जो व्यक्ति इसे ही सब कुछ मान लेता है, वह सत्य (परमात्मा) को खो देता है।

कामहैतुकम् का अर्थ है वासना को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानना। इससे व्यक्ति में लोभ, क्रोध और मोह की वृद्धि होती है, जो अंततः पतन का कारण बनता है।

हम यह सीख सकते हैं कि जीवन का उद्देश्य केवल उपभोग नहीं, बल्कि ईश्वर की सेवा और धर्म का पालन है।

आज के उपभोक्तावादी युग में यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक है, क्योंकि यह हमें भौतिकता की अंधी दौड़ में रुककर आत्म-चिंतन करने का संदेश देता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी प्रकृति के लोग कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, बिना आधार का है, ईश्वर से रहित है, और केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है – काम ही इसका एकमात्र कारण है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह नास्तिकतापूर्ण दृष्टिकोण मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। वास्तविकता यह है कि ईश्वर ही सृष्टि का कर्ता है और जगत् सत्य है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/24 33% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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