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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 8

अध्याय 16 · श्लोक 8

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् || ८||

asatyam apratiṣṭhaṃ te jagad āhur anīśvaram | aparaspara-sambhūtaṃ kim anyat kāma-haitukam ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

असत्यम्: असत्य; अप्रतिष्ठम्: आधारहीन; ते: वे; जगत्: जगत्; आहु: कहते हैं; अनीश्वरम्: ईश्वररहित; अपरस्परसम्भूतम्: परस्पर संयोग से उत्पन्न; किम्: क्या; अन्यत्: अन्य; कामहैतुकम्: कामना ही जिसका कारण है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वे कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, आधारहीन है, ईश्वररहित है, और केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है – काम ही इसका कारण है।

English Translation

They say that the world is unreal, without foundation, without a God, and produced by sexual union alone, with no other cause but lust.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग भौतिकवादी दृष्टिकोण रखते हैं। वे ईश्वर को नकारते हैं और जगत् को आकस्मिक या केवल कामजन्य मानते हैं। यह नास्तिकता का चरम रूप है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।