दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 7
श्लोक ७ में बताया गया कि आसुरी लोग प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं जानते, उनमें शौच, आचार और सत्य नहीं होता।
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७||
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca janā na vidur āsurāḥ | na śaucaṃ nāpi cācāro na satyaṃ teṣu vidyate ||7||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्रवृत्तिम्: प्रवृत्ति (कर्म करने की); च: और; निवृत्तिम्: निवृत्ति (त्याग की); च: और; जना: लोग; न: नहीं; विदु: जानते; आसुरा: आसुरी; न: नहीं; शौचम्: पवित्रता; न: नहीं; अपि: भी; च: और; आचार: आचार; न: नहीं; सत्यम्: सत्य; तेषु: उनमें; विद्यते: होता है।
हिंदी अनुवाद
आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्तव्य) को जानते हैं और न निवृत्ति (त्याग) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।
English Translation
Those who are demoniac do not know what to do and what to refrain from. They possess neither purity, nor proper conduct, nor truth.
टीका / Commentary
आसुरी लोग धर्म-अधर्म का विवेक नहीं रखते। वे शास्त्रविधि को नहीं मानते, इसलिए उनमें शौच, आचार और सत्य का अभाव होता है।