श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 7

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 22 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति (कर्म करने की)
च
और
निवृत्तिम्
निवृत्ति (त्याग की)
च
और
जना
लोग
न
नहीं
विदु
जानते
आसुरा
आसुरी
न
नहीं
शौचम्
पवित्रता
न
नहीं
अपि
भी
च
और
आचार
आचार
न
नहीं
सत्यम्
सत्य
तेषु
उनमें
विद्यते
होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्तव्य) को जानते हैं और न निवृत्ति (त्याग) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च - श्रीमद्भगवद्गीता आध्यात्मिक विश्लेषण

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का सातवां श्लोक मानव चेतना के दो ध्रुवों—दैवी और आसुरी—के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि आत्म-निरीक्षण का एक दर्पण है। 'प्रवृत्ति' का अर्थ है वह मार्ग जो हमें सांसारिक सुखों और कर्मों की ओर ले जाता है, जबकि 'निवृत्ति' वह मार्ग है जो हमें आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष की ओर ले जाता है। आसुरी स्वभाव के लोग इन दोनों के बीच के विवेक को खो देते हैं। वे न तो यह जानते हैं कि किस कर्म को करना चाहिए और किस कर्म से स्वयं को दूर रखना चाहिए।

वैदिक संस्कृति में, धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि 'ऋत' (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के साथ सामंजस्य बिठाना है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों का दास बन जाता है, तो उसकी बुद्धि मलिन हो जाती है। यह श्लोक हमें चेतावनी देता है कि यदि हमारे जीवन में शौच (पवित्रता), आचार (सदाचार) और सत्य का अभाव है, तो हम अनजाने में आसुरी प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर हो रहे हैं। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि जो व्यक्ति शास्त्र-सम्मत मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, वह अपनी ही आत्मा के प्रकाश को बुझा देता है। इस लेख के माध्यम से हम इस श्लोक के गूढ़ रहस्यों को समझेंगे और अपने जीवन को दैवी गुणों की ओर मोड़ने का प्रयास करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: |
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७ ||


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता रखें। 'प्रवृत्तिं' में अनुस्वार का उच्चारण नासिका से करें। यह श्लोक गीता के 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' का हिस्सा है। इसे शांत मन से, प्राणायाम के पश्चात पाठ करने से बुद्धि में सात्विकता का संचार होता है। प्रतिदिन तीन बार इसका मनन करने से व्यक्ति को अपने दैनिक निर्णयों में सही और गलत का बोध होने लगता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
प्रवृत्तिंकार्य करने की दिशासंसार में कर्म करने की प्रवृत्ति, जो बंधन का कारण बनती है।
निवृत्तिंकार्य से हटने की दिशाअध्यात्म की ओर मुड़ना, जो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
जना:लोगवे मनुष्य जो अज्ञानता के अंधकार में भटक रहे हैं।
आसुरा:आसुरी स्वभाव वालेवे जो केवल भौतिकता और स्वार्थ को ही सर्वोपरि मानते हैं।
न विदु:नहीं जानतेविवेक का अभाव, धर्म-अधर्म के भेद को न समझ पाना।
शौचंपवित्रताबाह्य और आंतरिक शुद्धि का पूर्ण अभाव।
आचार:सदाचारशिष्ट व्यवहार और शास्त्रों द्वारा निर्धारित मर्यादा का पालन।
सत्यंसत्यवाणी और मन की एकरूपता, जो आसुरी स्वभाव में नहीं होती।
विद्यतेहोता हैइन गुणों का अस्तित्व ही उनके व्यक्तित्व में नहीं मिलता।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दैवी और आसुरी संपदाओं का विस्तृत विवरण देते हैं। यह प्रसंग कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में घटित होता है, जहाँ अर्जुन को यह समझना आवश्यक था कि शत्रु केवल बाहरी नहीं, बल्कि भीतर छिपे हुए 'काम, क्रोध और लोभ' भी हैं। पौराणिक संदर्भों में, हिरण्यकशिपु और रावण जैसे पात्रों का उदाहरण दिया जाता है, जिन्होंने अपनी शक्ति के मद में 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति' के भेद को भुला दिया था।

वेदों में 'ऋत' और 'सत्य' को जगत का आधार माना गया है। जब मनुष्य अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर केवल उपभोग को ही जीवन का लक्ष्य मान लेता है, तो वह 'आसुरी' श्रेणी में आ जाता है। रामायण में विभीषण और रावण का संवाद इसी श्लोक के भाव को पुष्ट करता है। रावण के पास ज्ञान था, परंतु 'आचार' और 'सत्य' का अभाव था, जिसके कारण उसका विनाश निश्चित था। वहीं, प्रह्लाद ने अपने पिता के आसुरी स्वभाव के विपरीत 'शौच' और 'सत्य' को धारण किया। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शास्त्र-विधि का पालन करना केवल एक नियम नहीं, बल्कि स्वयं को विनाश से बचाने की एक ढाल है। ऐतिहासिक रूप से, ऋषियों ने इसे 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' कहा है, जो मनुष्य को यह चुनने की स्वतंत्रता देता है कि वह किस मार्ग पर चलना चाहता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • विवेक जागृति: नियमित पाठ से व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता (बुद्धि) में स्पष्टता आती है।
  • आंतरिक शुद्धि: 'शौच' के महत्व को समझने से मानसिक और शारीरिक स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ती है।
  • सदाचार का विकास: यह श्लोक व्यक्ति को सामाजिक और नैतिक मर्यादाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।
  • सत्यनिष्ठा: वाणी में सत्य का समावेश होता है, जिससे व्यक्तित्व में चुंबकीय आकर्षण और विश्वास पैदा होता है।
  • नकारात्मकता का नाश: आसुरी प्रवृत्तियों (क्रोध, लोभ, अहंकार) के प्रति सचेत होने से मन शांत रहता है।
  • कर्म-योग की समझ: क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका स्पष्ट बोध होने से जीवन में भटकाव कम होता है।
  • दैवी गुणों का उदय: निरंतर चिंतन से व्यक्ति में सात्विक गुणों का विकास होता है, जो मोक्ष का मार्ग है।
  • ब्रह्मांडीय सामंजस्य: शास्त्र-विधि के पालन से व्यक्ति प्रकृति और परमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों और भाष्यकारों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी) के दृष्टिकोणों को आधार मानकर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह विश्लेषण किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-सुधार और नैतिक उत्थान के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। संदर्भ हेतु गीता प्रेस गोरखपुर के 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' का अध्ययन अनुशंसित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

आसुरी स्वभाव का अर्थ है वह मानसिक स्थिति जिसमें व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ, इंद्रिय सुख और भौतिक संग्रह को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मानता है। ऐसे लोग धर्म, सत्य और सदाचार की परवाह नहीं करते।

प्रवृत्ति का अर्थ है संसार में लिप्त होकर कर्म करना, जबकि निवृत्ति का अर्थ है सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर आत्म-कल्याण की ओर प्रवृत्त होना। गीता हमें इन दोनों के बीच संतुलन सिखाती है।

शौच का अर्थ केवल शारीरिक स्वच्छता नहीं है, बल्कि मन, विचार और वाणी की पवित्रता भी है। जब हमारे विचार शुद्ध होते हैं, तभी हम ईश्वर के समीप पहुँच सकते हैं।

हाँ, गीता के अनुसार मनुष्य का स्वभाव उसके कर्मों और संगति से बनता है। शास्त्र-विधि का पालन, सत्संग और आत्म-चिंतन के माध्यम से कोई भी व्यक्ति अपने भीतर के आसुरी गुणों को त्याग कर दैवी गुणों को अपना सकता है।

शास्त्र-विधि उन अनुभवी ऋषियों का अनुभव है जो ब्रह्मांडीय नियमों पर आधारित है। इसका पालन करने से हम जीवन की जटिलताओं से बचते हैं और एक अनुशासित, सार्थक जीवन व्यतीत करते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्म करने की विधि) को जानते हैं और न निवृत्ति (कर्म त्यागने की विधि) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जिनमें विवेक नहीं, वे आसुरी होते हैं। सच्चा मनुष्य वह है जो शास्त्रों के अनुसार आचरण करता है और सत्य में स्थित रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/24 29% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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