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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 7

अध्याय 16 · श्लोक 7

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७||

pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca janā na vidur āsurāḥ | na śaucaṃ nāpi cācāro na satyaṃ teṣu vidyate ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

प्रवृत्तिम्: प्रवृत्ति (कर्म करने की); च: और; निवृत्तिम्: निवृत्ति (त्याग की); च: और; जना: लोग; न: नहीं; विदु: जानते; आसुरा: आसुरी; न: नहीं; शौचम्: पवित्रता; न: नहीं; अपि: भी; च: और; आचार: आचार; न: नहीं; सत्यम्: सत्य; तेषु: उनमें; विद्यते: होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्तव्य) को जानते हैं और न निवृत्ति (त्याग) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।

English Translation

Those who are demoniac do not know what to do and what to refrain from. They possess neither purity, nor proper conduct, nor truth.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग धर्म-अधर्म का विवेक नहीं रखते। वे शास्त्रविधि को नहीं मानते, इसलिए उनमें शौच, आचार और सत्य का अभाव होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।