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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 6

अध्याय 16 · श्लोक 6

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च | दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु || ६||

dvau bhūta-sargau loke 'smin daiva āsura eva ca | daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

द्वौ: दो; भूतसर्गौ: प्राणियों की सृष्टियाँ; लोके: लोक में; अस्मिन्: इस; दैव: दैवी; आसुर: आसुरी; एव: ही; च: और; दैव: दैवी; विस्तरश: विस्तार से; प्रोक्त: कही गई; आसुरम्: आसुरी; पार्थ: हे पार्थ; मे: मुझसे; शृणु: सुनो।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इस लोक में प्राणियों की दो सृष्टियाँ हैं – दैवी और आसुरी। दैवी का तो विस्तार से वर्णन किया गया; हे पार्थ! अब आसुरी सम्पदा को मुझसे सुनो।

English Translation

There are two types of beings in this world: the divine and the demoniac. The divine has been described at length; now hear from Me about the demoniac, O Partha.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान अब आसुरी प्रकृति का विस्तार से वर्णन करेंगे। पहले दैवी गुण बताए, अब आसुरी गुणों का वर्णन आवश्यक है ताकि उनसे बचा जा सके।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।