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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 5

अध्याय 16 · श्लोक 5

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता | मा शुच: सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव || ५||

daivī sampad vimokṣāya nibandhāyāsurī matā | mā śucaḥ sampadaṃ daivīm abhijāto 'si pāṇḍava ||5||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

दैवी: दैवी; सम्पत्: सम्पदा; विमोक्षाय: मोक्ष के लिए; निबन्धाय: बन्धन के लिए; आसुरी: आसुरी; मता: मानी गई है; मा: मत; शुच: शोक करो; सम्पदम्: सम्पदा; दैवीम्: दैवी; अभिजात: उत्पन्न हुए; असि: हो; पाण्डव: हे पाण्डव।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव! तुम शोक मत करो, तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो।

English Translation

The divine nature is deemed for liberation, the demoniac for bondage. Grieve not, O Pandava (Arjuna), for you are born with divine qualities.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अर्जुन को आश्वस्त करता है कि वे दैवी प्रकृति के हैं, इसलिए मोक्ष के अधिकारी हैं। आसुरी प्रकृति बंधन का कारण बनती है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।