दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 3
श्लोक ३ में तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और अतिमान का अभाव – दैवी गुणों की पूर्ति।
संस्कृत श्लोक
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || ३||
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā | bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ||3||
पदच्छेद / शब्दार्थ
तेज: तेज; क्षमा: क्षमा; धृति: धैर्य; शौचम्: पवित्रता; अद्रोह: द्रोह न करना; नातिमानिता: अति मान का न होना; भवन्ति: हैं; सम्पदम्: सम्पदा; दैवीम्: दैवी; अभिजातस्य: जो पैदा हुआ है; भारत: हे भारत (अर्जुन)।
हिंदी अनुवाद
हे भारत! तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अभिमान का न होना — ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
English Translation
Vigor, forgiveness, fortitude, cleanliness, freedom from envy and the absence of pride—these are the qualities of one endowed with divine nature, O Bharata (Arjuna).
टीका / Commentary
इस श्लोक में दैवी सम्पदा के अंतिम गुण बताए गए हैं। तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और नातिमानिता – ये सब मिलकर दैवी प्रकृति के व्यक्ति को परिभाषित करते हैं।