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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 3

अध्याय 16 · श्लोक 3

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || ३||

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā | bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तेज: तेज; क्षमा: क्षमा; धृति: धैर्य; शौचम्: पवित्रता; अद्रोह: द्रोह न करना; नातिमानिता: अति मान का न होना; भवन्ति: हैं; सम्पदम्: सम्पदा; दैवीम्: दैवी; अभिजातस्य: जो पैदा हुआ है; भारत: हे भारत (अर्जुन)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भारत! तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अभिमान का न होना — ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

English Translation

Vigor, forgiveness, fortitude, cleanliness, freedom from envy and the absence of pride—these are the qualities of one endowed with divine nature, O Bharata (Arjuna).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस श्लोक में दैवी सम्पदा के अंतिम गुण बताए गए हैं। तेज, क्षमा, धृति, शौच, अद्रोह और नातिमानिता – ये सब मिलकर दैवी प्रकृति के व्यक्ति को परिभाषित करते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।