दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 2

श्लोक २ में अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, अपैशुन, दया, अलोलुप्त्व, मार्दव, ह्री और अचापल – ये दैवी गुण बताए गए हैं।

संस्कृत श्लोक

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || २||

ahiṃsā satyam akrodhas tyāgaḥ śāntir apaiśunam | dayā bhūteṣv aloluptvaṃ mārdavaṃ hrīr acāpalam ||2||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अहिंसा: अहिंसा; सत्यम्: सत्य; अक्रोध: क्रोध का अभाव; त्याग: त्याग; शान्ति: शान्ति; अपैशुनम्: किसी की निन्दा न करना; दया: दया; भूतेषु: सभी प्राणियों में; अलोलुप्त्वम्: लोलुपता का अभाव; मार्दवम्: कोमलता; ह्री: लज्जा; अचापलम्: चपलता का अभाव।

हिंदी अनुवाद

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोलुपता न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव — ये भी दैवी गुण हैं।

English Translation

Non-violence, truthfulness, freedom from anger, renunciation, tranquility, aversion to fault-finding, compassion for all living entities, freedom from covetousness, gentleness, modesty, and steady determination;

टीका / Commentary

यह श्लोक दैवी सम्पदा के और गुणों का वर्णन करता है। अहिंसा से अचापल तक के ये गुण सात्त्विक जीवन के लक्षण हैं।