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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 2

अध्याय 16 · श्लोक 2

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || २||

ahiṃsā satyam akrodhas tyāgaḥ śāntir apaiśunam | dayā bhūteṣv aloluptvaṃ mārdavaṃ hrīr acāpalam ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अहिंसा: अहिंसा; सत्यम्: सत्य; अक्रोध: क्रोध का अभाव; त्याग: त्याग; शान्ति: शान्ति; अपैशुनम्: किसी की निन्दा न करना; दया: दया; भूतेषु: सभी प्राणियों में; अलोलुप्त्वम्: लोलुपता का अभाव; मार्दवम्: कोमलता; ह्री: लज्जा; अचापलम्: चपलता का अभाव।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोलुपता न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव — ये भी दैवी गुण हैं।

English Translation

Non-violence, truthfulness, freedom from anger, renunciation, tranquility, aversion to fault-finding, compassion for all living entities, freedom from covetousness, gentleness, modesty, and steady determination;

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक दैवी सम्पदा के और गुणों का वर्णन करता है। अहिंसा से अचापल तक के ये गुण सात्त्विक जीवन के लक्षण हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।