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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 1

अध्याय 16 · श्लोक 1

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || १||

śrī-bhagavān uvāca abhayaṃ sattva-saṃśuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ | dānaṃ damaś ca yajñaś ca svādhyāyas tapa ārjavam ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: भगवान ने; उवाच: कहा; अभयम्: निर्भयता; सत्त्वसंशुद्धि: अन्त:करण की शुद्धि; ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ज्ञानयोग में स्थिति; दानम्: दान; दम: इन्द्रियों का दमन; च: और; यज्ञ: यज्ञ; च: तथा; स्वाध्याय: वेदाभ्यास; तप: तप; आर्जवम्: सरलता।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: निर्भयता, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये सब दैवी सम्पदा के लक्षण हैं।

English Translation

The Blessed Lord said: Fearlessness, purification of one's existence, cultivation of spiritual knowledge, charity, self-control, performance of sacrifice, study of the Vedas, austerity and simplicity;

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान अर्जुन को दैवी और आसुरी प्रकृतियों के लक्षण समझाने लगते हैं। पहले श्लोक में नौ दैवी गुण बताए गए हैं – अभय से आर्जव तक। ये गुण आत्मोन्नति के मार्ग पर चलने वाले साधक में होने चाहिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।