दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 1
श्लोक १ में भगवान दैवी गुणों की सूची आरम्भ करते हैं: निर्भयता, अन्त:करण शुद्धि, ज्ञाननिष्ठा, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता।
संस्कृत श्लोक
श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || १||
śrī-bhagavān uvāca abhayaṃ sattva-saṃśuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ | dānaṃ damaś ca yajñaś ca svādhyāyas tapa ārjavam ||1||
पदच्छेद / शब्दार्थ
श्रीभगवान्: भगवान ने; उवाच: कहा; अभयम्: निर्भयता; सत्त्वसंशुद्धि: अन्त:करण की शुद्धि; ज्ञानयोगव्यवस्थिति: ज्ञानयोग में स्थिति; दानम्: दान; दम: इन्द्रियों का दमन; च: और; यज्ञ: यज्ञ; च: तथा; स्वाध्याय: वेदाभ्यास; तप: तप; आर्जवम्: सरलता।
हिंदी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले: निर्भयता, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये सब दैवी सम्पदा के लक्षण हैं।
English Translation
The Blessed Lord said: Fearlessness, purification of one's existence, cultivation of spiritual knowledge, charity, self-control, performance of sacrifice, study of the Vedas, austerity and simplicity;
टीका / Commentary
भगवान अर्जुन को दैवी और आसुरी प्रकृतियों के लक्षण समझाने लगते हैं। पहले श्लोक में नौ दैवी गुण बताए गए हैं – अभय से आर्जव तक। ये गुण आत्मोन्नति के मार्ग पर चलने वाले साधक में होने चाहिए।