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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 18

अध्याय 16 · श्लोक 18

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ | mām ātma-para-deheṣu pradviṣanto 'bhyasūyakāḥ ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अहङ्कारम्: अहंकार; बलम्: बल; दर्पम्: घमण्ड; कामम्: काम; क्रोधम्: क्रोध; च: और; संश्रिता: आश्रित; माम्: मुझको; आत्मपरदेहेषु: अपने और दूसरों के शरीरों में; प्रद्विषन्त: द्वेष करते हुए; अभ्यसूयका: ईर्ष्यालु।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ परमात्मा को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं तथा ईर्ष्या करते हैं।

English Translation

Given to egoism, power, arrogance, lust and anger, they hate Me, who dwells in their own bodies and in those of others, and they envy all.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध से ग्रस्त रहते हैं। वे ईश्वर को नहीं पहचानते, बल्कि उससे द्वेष करते हैं और दूसरों से ईर्ष्या रखते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।