श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 18

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 24 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अहङ्कारम्
अहंकार
बलम्
बल
दर्पम्
घमण्ड
कामम्
काम
क्रोधम्
क्रोध
च
और
संश्रिता
आश्रित
माम्
मुझको
आत्मपरदेहेषु
अपने और दूसरों के शरीरों में
प्रद्विषन्त
द्वेष करते हुए
अभ्यसूयका
ईर्ष्यालु।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ परमात्मा को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं तथा ईर्ष्या करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अहङ्कारं बलं दर्पं - श्रीमद्भगवद्गीता आध्यात्मिक विश्लेषण

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय, जिसे 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' कहा गया है, का अठारहवां श्लोक मानव चेतना के पतन और उसके अंधकारमय मार्ग का एक अत्यंत सटीक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक चित्रण प्रस्तुत करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उन प्रवृत्तियों से सावधान कर रहे हैं जो आत्मा को परमात्मा से विमुख कर देती हैं। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि मानव स्वभाव का वह दर्पण है जिसमें हम अपने भीतर छिपे उन शत्रुओं को देख सकते हैं जो हमें शांति और मोक्ष से दूर ले जाते हैं।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक 'आसुरी संपदा' के उन स्तंभों को उजागर करता है जो सृष्टि के संतुलन को बिगाड़ने का कार्य करते हैं। जब मनुष्य अहंकार (अहं), बल (शक्ति का दुरुपयोग), दर्प (मिथ्या गर्व), काम (अतृप्त इच्छाएं) और क्रोध (असंतोष की ज्वाला) को अपना आश्रय बना लेता है, तो वह स्वयं के भीतर स्थित परमात्मा को पहचानने में असमर्थ हो जाता है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत पतन नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था के विरुद्ध एक विद्रोह है। वैदिक दर्शन के अनुसार, मनुष्य का शरीर 'क्षेत्र' है और इसमें स्थित आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' है। जब हम अपने ही शरीर में स्थित उस दिव्य तत्व (परमात्मा) के प्रति द्वेष रखते हैं, तो हम वास्तव में स्वयं के अस्तित्व को ही नकार रहे होते हैं। यह श्लोक हमें आत्म-अवलोकन की वह दृष्टि प्रदान करता है, जिसके माध्यम से हम अपनी तामसिक वृत्तियों का दमन कर सात्विक प्रकाश की ओर अग्रसर हो सकते हैं। यह ज्ञान हमें यह समझने में सहायता करता है कि वास्तविक शक्ति अहंकार में नहीं, अपितु समर्पण और विनम्रता में निहित है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: |
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||


श्लोक का भावार्थ: वे आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के आश्रित रहते हैं। वे अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं और संतों व सज्जनों के प्रति ईर्ष्या (अभ्यसूया) का भाव रखते हैं।

यह श्लोक हमें यह बोध कराता है कि आसुरी प्रवृत्ति का व्यक्ति केवल बाहरी जगत से ही नहीं, बल्कि अपने भीतर के दिव्य अंश से भी शत्रुता मोल ले लेता है। जब कोई व्यक्ति अहंकार के वशीभूत होकर अपनी शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन करता है और काम-क्रोध में अंधा होकर दूसरों की निंदा करता है, तो वह ईश्वर के उस अंश को अपमानित करता है जो प्रत्येक जीव के हृदय में विराजमान है। यह श्लोक चेतावनी है कि जो व्यक्ति दूसरों के प्रति द्वेष रखता है, वह वास्तव में स्वयं के भीतर के ईश्वर को ही प्रताड़ित कर रहा है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अहङ्कारम्अहंकारस्वयं को शरीर मान लेना और आत्मा को भूल जाना।
बलम्शारीरिक/मानसिक शक्तिशक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए करना।
दर्पम्मिथ्या गर्वअपनी उपलब्धियों पर घमंड करना और दूसरों को तुच्छ समझना।
कामम्अतृप्त वासनाइंद्रियों के सुख के लिए निरंतर भागना।
क्रोधम्क्रोधइच्छाओं में बाधा आने पर उत्पन्न होने वाली हिंसा।
संश्रिता:आश्रय लेने वालेइन दुर्गुणों को ही अपना जीवन का आधार बना लेना।
माम्मुझको (ईश्वर)प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित परमात्मा।
आत्मपरदेहेषुअपने और दूसरों के शरीर मेंसर्वव्यापी ईश्वर का बोध न होना।
प्रद्विषन्तःद्वेष करने वालेईश्वर के प्रति शत्रुता का भाव रखना।
अभ्यसूयका:ईर्ष्यालुदूसरों के गुणों में दोष ढूंढने की प्रवृत्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों के बीच का अंतर समझा रहे हैं। पौराणिक संदर्भों में, असुरों का वर्णन केवल राक्षसों के रूप में नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों के रूप में किया गया है जो अपनी बुद्धि का उपयोग धर्म के विरुद्ध करते हैं। हिरण्यकशिपु और रावण जैसे पात्रों का उदाहरण लें, तो वे बल, दर्प और अहंकार के चरमोत्कर्ष थे। हिरण्यकशिपु ने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया था, जो कि 'अहंकार' का सबसे विकृत रूप है।

वेदों में 'अहं' को 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) के रूप में भी देखा गया है, लेकिन जब यह 'अहं' शरीर और अहंकार के साथ जुड़ जाता है, तो यह पतन का कारण बनता है। महाभारत के युद्ध में दुर्योधन का चरित्र इसी श्लोक का जीवंत उदाहरण है। दुर्योधन के पास बल था, दर्प था, और वह काम-क्रोध से पूरी तरह ग्रस्त था। उसने अपने ही कुल के पांडवों में स्थित परमात्मा के अंश को पहचानने से इनकार कर दिया और उनसे द्वेष किया। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आसुरी प्रवृत्ति का मूल कारण 'अविद्या' है। जब मनुष्य यह भूल जाता है कि वह केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक आत्मा है, तब वह इन पांच विकारों (अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध) की शरण में चला जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि 'काम' ही 'क्रोध' का जनक है। जब काम की पूर्ति नहीं होती, तो क्रोध उत्पन्न होता है, और क्रोध से विवेक का नाश होता है। यह चक्र ही संसार के दुखों का मूल कारण है। इस श्लोक के माध्यम से महर्षि वेदव्यास ने हमें एक मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शिका दी है, ताकि हम अपने भीतर के 'दुर्योधन' को पहचान सकें और उसे परास्त कर सकें।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-जागरूकता: इस श्लोक का नियमित चिंतन करने से व्यक्ति को अपने भीतर के छिपे हुए अहंकार का बोध होता है।
  • क्रोध पर नियंत्रण: काम और क्रोध के दुष्परिणामों को जानकर व्यक्ति अपनी भावनाओं को संतुलित करना सीखता है।
  • ईर्ष्या का त्याग: 'अभ्यसूयका:' शब्द पर ध्यान केंद्रित करने से दूसरों के प्रति ईर्ष्या कम होती है और करुणा का उदय होता है।
  • मानसिक शांति: जब हम यह स्वीकार करते हैं कि ईश्वर सभी में हैं, तो द्वेष का भाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): सात्विक विचारों के समावेश से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य आकर्षण और शांति का संचार होता है।
  • कर्म शुद्धि: आसुरी प्रवृत्तियों से बचकर व्यक्ति अपने कर्मों को निष्काम भाव की ओर ले जा सकता है।
  • दैवीय कृपा: जब हम अहंकार का त्याग करते हैं, तो ईश्वर की कृपा का पात्र बनने का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • विवेक की जागृति: यह श्लोक बुद्धि को कुतर्क से हटाकर सत्य के मार्ग पर ले जाने में सहायक है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय (दैवासुरसंपद्विभागयोग) के मूल संस्कृत श्लोकों और आचार्य शंकर तथा स्वामी रामसुखदास जी के भाष्य के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-सुधार और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

आसुरी प्रवृत्ति का मुख्य लक्षण अहंकार, काम और क्रोध को अपना आधार बनाना है। ऐसा व्यक्ति स्वयं को ही सर्वोपरि मानता है और दूसरों के प्रति द्वेष रखता है।

अहंकार का अर्थ है 'मैं' का भाव। इसे पूरी तरह त्यागने के बजाय, इसे 'दास भाव' या 'ईश्वर के अंश' के रूप में परिवर्तित करना ही आध्यात्मिक उन्नति है।

यह अभ्यास 'सर्वभूतस्थमात्मानं' (सब प्राणियों में आत्मा को देखना) के माध्यम से संभव है। जब हम यह समझते हैं कि जो आत्मा हमारे भीतर है, वही दूसरों में भी है, तो द्वेष समाप्त हो जाता है।

काम और क्रोध से बचने का एकमात्र उपाय 'वैराग्य' और 'भक्ति' है। जब मन ईश्वर के चिंतन में लगा रहता है, तो सांसारिक इच्छाएं स्वतः कम हो जाती हैं।

दैनिक जीवन में, यह श्लोक हमें किसी भी निर्णय को लेने से पहले यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अहंकार या क्रोध से प्रेरित होकर कार्य कर रहे हैं। यह आत्म-संयम का एक शक्तिशाली उपकरण है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ (परमात्मा) को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं और ईर्ष्यालु होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अहंकार और द्वेष मनुष्य को ईश्वर से दूर कर देते हैं। ईश्वर सबमें है, इस भाव से प्रेम करना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/24 75% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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