दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 18

श्लोक १८ में कहा गया कि आसुरी लोग अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध के वशीभूत होकर ईश्वर से द्वेष करते हैं।

संस्कृत श्लोक

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ | mām ātma-para-deheṣu pradviṣanto 'bhyasūyakāḥ ||18||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अहङ्कारम्: अहंकार; बलम्: बल; दर्पम्: घमण्ड; कामम्: काम; क्रोधम्: क्रोध; च: और; संश्रिता: आश्रित; माम्: मुझको; आत्मपरदेहेषु: अपने और दूसरों के शरीरों में; प्रद्विषन्त: द्वेष करते हुए; अभ्यसूयका: ईर्ष्यालु।

हिंदी अनुवाद

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ परमात्मा को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं तथा ईर्ष्या करते हैं।

English Translation

Given to egoism, power, arrogance, lust and anger, they hate Me, who dwells in their own bodies and in those of others, and they envy all.

टीका / Commentary

आसुरी लोग अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध से ग्रस्त रहते हैं। वे ईश्वर को नहीं पहचानते, बल्कि उससे द्वेष करते हैं और दूसरों से ईर्ष्या रखते हैं।