श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 17

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 23 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || १७||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
आत्मसम्भाविता
आत्म-प्रशंसक
स्तब्धा
अकड़ने वाले
धनमानमदान्विता
धन और मान के मद से युक्त
यजन्ते
यज्ञ करते हैं
नामयज्ञै
केवल नाम के यज्ञों से
ते
वे
दम्भेन
दम्भ से
अविधिपूर्वकम्
विधि रहित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे केवल नाम के यज्ञों को दम्भ से करते हैं, विधि के अनुसार नहीं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का सत्रहवां श्लोक मानव मनोविज्ञान और आध्यात्मिक पतन की उस सूक्ष्म रेखा को रेखांकित करता है, जहाँ धर्म भी अहंकार का साधन बन जाता है। वैदिक परंपरा में 'यज्ञ' को ब्रह्मांडीय संतुलन का आधार माना गया है, किंतु जब यही यज्ञ 'दम्भ' (पाखंड) और 'अविधि' (शास्त्रों के उल्लंघन) के साथ किया जाता है, तो वह पुण्य के स्थान पर कर्म-बंधन का कारण बन जाता है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने 'आसुरी स्वभाव' वाले व्यक्तियों की उस मानसिक स्थिति का वर्णन किया है, जो स्वयं को ही सब कुछ मान बैठते हैं। 'आत्मसम्भाविता:' का अर्थ है—जो स्वयं को ही अपना गुरु और मार्गदर्शक मान लेते हैं। जब मनुष्य के भीतर से 'ईश्वर-केंद्रित' भाव समाप्त होकर 'अहंकार-केंद्रित' भाव जागृत होता है, तब उसके द्वारा किए गए दान, तप और यज्ञ भी केवल सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के साधन मात्र रह जाते हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सचेत करता है कि धर्म केवल बाहरी क्रियाकलापों का नाम नहीं है, अपितु यह अंतःकरण की शुद्धि की प्रक्रिया है। यदि यज्ञ में 'अहं' का विसर्जन नहीं हुआ, तो वह यज्ञ नहीं, अपितु 'नामयज्ञ' (केवल नाम के लिए किया गया दिखावा) है। यह श्लोक आज के युग में अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ डिजिटल प्रदर्शन और दिखावे की संस्कृति ने आध्यात्मिक साधनाओं को भी प्रभावित किया है। इस श्लोक का चिंतन हमें आत्म-अवलोकन (Self-introspection) की ओर ले जाता है, जिससे हम अपने कर्मों को 'दम्भ' से मुक्त कर 'निष्कपट' भाव में प्रतिष्ठित कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: ।

यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥

श्लोक का उच्चारण एवं विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन में सात्विकता का भाव रखना अनिवार्य है। इसे गीता के 16वें अध्याय के 'दैवासुरसम्पद्विभागयोग' के अंतर्गत पढ़ा जाता है। पाठ करने से पूर्व शुचि होकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। श्लोक के प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और लयबद्ध होना चाहिए। यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि धर्म का मार्ग 'अहंकार' के विनाश से होकर गुजरता है, न कि 'अहंकार' के पोषण से। प्रतिदिन इस श्लोक का मनन करने से व्यक्ति अपने भीतर छिपे हुए सूक्ष्म दम्भ को पहचानने में समर्थ होता है और धीरे-धीरे अपने कर्मों को शास्त्र-सम्मत बनाने का प्रयास करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आत्मसम्भाविता:स्वयं को ही श्रेष्ठ मानने वालेअहंकार की पराकाष्ठा, जहाँ व्यक्ति गुरु और शास्त्र को नकार देता है।
स्तब्धा:अकड़े हुए / घमंडीविनम्रता का अभाव, जो आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।
धनमानमदान्विता:धन और मान के मद से युक्तसांसारिक उपलब्धियों को ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लेना।
यजन्तेयज्ञ करते हैंधार्मिक क्रियाओं का प्रदर्शन करना।
नामयज्ञै:नाममात्र के यज्ञों सेजिसमें केवल नाम है, पर सार (तत्व) का अभाव है।
दम्भेनपाखंड के साथदिखावे की भावना, जो भीतर से खोखली है।
अविधिपूर्वकम्शास्त्रों की विधि के विरुद्धअपनी मनमानी से धर्म का पालन करना।
तेवे (आसुरी लोग)अज्ञान और मोह के वशीभूत जीव।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का विस्तृत वर्णन किया है। यह श्लोक उस आसुरी संपदा का हिस्सा है जो मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है। पौराणिक संदर्भों में, हिरण्यकशिपु और रावण जैसे पात्रों का उदाहरण लिया जा सकता है, जिन्होंने अपनी शक्ति और धन के मद में स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया था।

महाभारत के युद्ध से पूर्व, जब दुर्योधन ने अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए राजसूय यज्ञ की नकल करने का प्रयास किया, तो वह केवल 'नामयज्ञ' ही सिद्ध हुआ। शास्त्र कहते हैं कि यज्ञ का अर्थ है 'देवपूजा, संगतिकरण और दान'। जब इन तीनों में 'दम्भ' का समावेश हो जाता है, तो वह यज्ञ 'आसुरी' बन जाता है। वेदों में यज्ञ को 'श्रेष्ठतम कर्म' कहा गया है, किंतु उसकी शर्त है—'श्रद्धा'। बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कार्य, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, निष्फल है।

ऋषि-मुनियों ने स्पष्ट किया है कि 'आत्मसम्भाविता' का अर्थ है—स्वयं को ही कर्ता मान लेना। जब मनुष्य यह भूल जाता है कि वह केवल एक निमित्त मात्र है और सब कुछ परमात्मा की इच्छा से हो रहा है, तब वह 'स्तब्ध' (अकड़ा हुआ) हो जाता है। यह श्लोक हमें उस प्राचीन सत्य की याद दिलाता है कि धर्म का मार्ग 'अकिंचनता' (स्वयं को शून्य मानने) का मार्ग है। जो व्यक्ति स्वयं को जितना रिक्त करता है, परमात्मा उसे उतना ही भरते हैं। इसके विपरीत, जो स्वयं को 'पूर्ण' मान लेता है, उसके लिए विकास के द्वार बंद हो जाते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-निरीक्षण की क्षमता: इस श्लोक का नित्य पाठ करने से व्यक्ति के भीतर अपने अहंकार को पहचानने की सूक्ष्म दृष्टि विकसित होती है।
  • दम्भ का नाश: यह श्लोक 'दम्भ' के दुष्प्रभावों को स्पष्ट करता है, जिससे साधक के मन में दिखावे की प्रवृत्ति कम होती है।
  • विनम्रता का उदय: 'स्तब्धता' के विपरीत, साधक में विनम्रता और सेवा भाव का संचार होता है।
  • शास्त्र-सम्मत आचरण: 'अविधिपूर्वक' कार्यों से बचने की प्रेरणा मिलती है, जिससे जीवन में अनुशासन आता है।
  • मानसिक शांति: जब हम स्वयं को 'कर्ता' मानना छोड़ देते हैं, तो तनाव और चिंता स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
  • कर्मिक शुद्धि: निष्काम भाव से किए गए कार्य ही कर्म-बंधन को काटते हैं; यह श्लोक हमें सकाम कर्मों के प्रति सचेत करता है।
  • दैवी गुणों का विकास: आसुरी प्रवृत्तियों का ज्ञान होने से व्यक्ति स्वतः ही दैवी गुणों (जैसे दया, क्षमा, दान) की ओर अग्रसर होता है।
  • ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति: जब अहंकार का आवरण हटता है, तो भक्त को परमात्मा की कृपा का अनुभव होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'भक्तिलोक' (Bhaktilok.in) के संपादकीय विभाग द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों, विशेषकर शंकराचार्य और श्रीधर स्वामी की टीकाओं के आधार पर तैयार की गई है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य किसी भी संप्रदाय विशेष का खंडन करना नहीं, बल्कि सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को सरल और बोधगम्य भाषा में जनमानस तक पहुँचाना है। यह 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जो शास्त्रों के गूढ़ अर्थों को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल बौद्धिक ज्ञान न मानकर, अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, यदि दान देते समय मन में 'प्रतिष्ठा' या 'दिखावे' की भावना हो, तो वह सात्विक दान नहीं कहलाता। गीता के 17वें अध्याय में इसे 'राजस' या 'तामस' दान की श्रेणी में रखा गया है।

इसका अर्थ है—जो व्यक्ति स्वयं को ही अपना गुरु मान ले और शास्त्रों के मार्गदर्शन को तुच्छ समझे। यह अहंकार की वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपनी बुद्धि को ही अंतिम सत्य मान लेता है।

नामयज्ञ का अर्थ है—ऐसा यज्ञ जो केवल नाम के लिए, प्रसिद्धि के लिए या दिखावे के लिए किया जाए। इसमें ईश्वर के प्रति समर्पण का अभाव होता है।

शास्त्रविधि हमें उन गलतियों से बचाती है जो हमारे अहंकार के कारण हो सकती हैं। यह एक सुरक्षित मार्ग है जो हमें भटकने से रोकता है।

अपने हर कार्य में 'मैं' को हटाकर 'ईश्वर' को केंद्र में रखें। कार्य करते समय यह विचार करें कि क्या यह कार्य अहंकार की तुष्टि के लिए है या सेवा के लिए।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे दम्भ से केवल नाम के यज्ञों को विधि रहित करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

दम्भ से किया गया धर्म भी अधर्म है। सच्चा धर्म विनम्रता और शास्त्रविधि से किया जाना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/24 71% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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