दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 17
श्लोक १७ में बताया गया कि आसुरी लोग अहंकारी, धनमद से युक्त, दम्भ से नाममात्र के यज्ञ करते हैं।
संस्कृत श्लोक
आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || १७||
ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ | yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam ||17||
पदच्छेद / शब्दार्थ
आत्मसम्भाविता: आत्म-प्रशंसक; स्तब्धा: अकड़ने वाले; धनमानमदान्विता: धन और मान के मद से युक्त; यजन्ते: यज्ञ करते हैं; नामयज्ञै: केवल नाम के यज्ञों से; ते: वे; दम्भेन: दम्भ से; अविधिपूर्वकम्: विधि रहित।
हिंदी अनुवाद
आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे केवल नाम के यज्ञों को दम्भ से करते हैं, विधि के अनुसार नहीं।
English Translation
Self-conceited, stubborn, filled with pride and intoxication of wealth, they perform sacrifices in name only, out of hypocrisy, not following the prescribed rules.
टीका / Commentary
आसुरी लोग यज्ञ-आदि धार्मिक कार्य भी दम्भ और अहंकार से करते हैं, शास्त्रविधि का पालन नहीं करते। उनके कर्म केवल दिखावे के लिए होते हैं।