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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 17

अध्याय 16 · श्लोक 17

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || १७||

ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ | yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

आत्मसम्भाविता: आत्म-प्रशंसक; स्तब्धा: अकड़ने वाले; धनमानमदान्विता: धन और मान के मद से युक्त; यजन्ते: यज्ञ करते हैं; नामयज्ञै: केवल नाम के यज्ञों से; ते: वे; दम्भेन: दम्भ से; अविधिपूर्वकम्: विधि रहित।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे केवल नाम के यज्ञों को दम्भ से करते हैं, विधि के अनुसार नहीं।

English Translation

Self-conceited, stubborn, filled with pride and intoxication of wealth, they perform sacrifices in name only, out of hypocrisy, not following the prescribed rules.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग यज्ञ-आदि धार्मिक कार्य भी दम्भ और अहंकार से करते हैं, शास्त्रविधि का पालन नहीं करते। उनके कर्म केवल दिखावे के लिए होते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।