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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 16

अध्याय 16 · श्लोक 16

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: | प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || १६||

aneka-citta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛtāḥ | prasaktāḥ kāma-bhogeṣu patanti narake 'śucau ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनेकचित्तविभ्रान्ता: अनेक प्रकार के चित्तों से विभ्रान्त; मोहजालसमावृता: मोह के जाल से घिरे हुए; प्रसक्ता: आसक्त; कामभोगेषु: भोगों में; पतन्ति: गिरते हैं; नरके: नरक में; अशुचौ: अपवित्र।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अनेक प्रकार की चित्तवृत्तियों से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, काम-भोगों में अत्यधिक आसक्त होकर वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

English Translation

Bewildered by numerous thoughts, entangled in the net of delusion, deeply attached to sense enjoyments, they fall into a foul hell.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग मानसिक भ्रम में रहते हैं। वे मोहजाल में फँसे होते हैं और भोगों में आसक्ति के कारण अधोगति को प्राप्त होते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।