श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 16

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 23 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: | प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || १६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
अनेकचित्तविभ्रान्ता
अनेक प्रकार के चित्तों से विभ्रान्त
मोहजालसमावृता
मोह के जाल से घिरे हुए
प्रसक्ता
आसक्त
कामभोगेषु
भोगों में
पतन्ति
गिरते हैं
नरके
नरक में
अशुचौ
अपवित्र।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अनेक प्रकार की चित्तवृत्तियों से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, काम-भोगों में अत्यधिक आसक्त होकर वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय, जिसे 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' के नाम से जाना जाता है, में भगवान श्रीकृष्ण ने मानवीय प्रवृत्तियों का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। प्रस्तुत श्लोक (१६.१६) उस मानसिक अवस्था का चित्रण करता है जहाँ जीव अपनी विवेक बुद्धि को खोकर भौतिकता के मायाजाल में पूरी तरह उलझ जाता है। यह श्लोक केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि मानव चेतना के पतन की प्रक्रिया का एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मानचित्र है।

वैदिक दर्शन के अनुसार, मनुष्य का चित्त जब तक सात्विक गुणों से अनुप्राणित नहीं होता, तब तक वह 'अनेकचित्तविभ्रान्ता' की स्थिति में रहता है। इसका अर्थ है कि मन एक साथ हजारों दिशाओं में भटक रहा है। जब मन का बिखराव होता है, तो व्यक्ति 'मोहजाल' यानी भ्रम के उस चक्रव्यूह में फँस जाता है, जहाँ उसे सत्य और असत्य, क्षणिक और शाश्वत के बीच का भेद दिखाई देना बंद हो जाता है। यह मोहजाल ही वह अदृश्य बंधन है जो आत्मा को उसके दिव्य स्वरूप से विलग कर देता है।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन का उद्देश्य केवल इंद्रिय-सुख (कामभोग) नहीं है। जब कोई समाज या व्यक्ति केवल भौतिक उपभोग को ही जीवन का परम लक्ष्य मान लेता है, तो वह 'अशुचि' यानी अपवित्र नरक की ओर अग्रसर होता है। यहाँ 'नरक' का अर्थ केवल मृत्यु के बाद का स्थान नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन में व्याप्त मानसिक अशांति, द्वेष, भय और असंतोष की स्थिति भी है। इस श्लोक का अध्ययन हमें आत्म-निरीक्षण करने और अपनी चेतना को निम्नगामी प्रवृत्तियों से ऊपर उठाकर दैवीय गुणों की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है। यह सनातन धर्म का वह सार है जो हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: |
प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || १६||

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के स्पष्ट उच्चारण पर ध्यान देना चाहिए। 'अनेकचित्तविभ्रान्ता' में 'विभ्रान्ता' का उच्चारण करते समय नासिका का हल्का प्रयोग करें। 'मोहजालसमावृता:' में विसर्ग का उच्चारण 'ह' की ध्वनि के साथ करें। 'पतन्ति नरकेऽशुचौ' में 'अशुचौ' का अर्थ अपवित्र है, अतः इसे गंभीरता और बोध के साथ उच्चारित करें। प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के पश्चात गीता के इन श्लोकों का पाठ करने से मन में सात्विक विचारों का संचार होता है और आसुरी प्रवृत्तियों का शमन होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अनेकचित्तविभ्रान्ताअनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वालेमन की चंचलता जो एकाग्रता को नष्ट कर देती है।
मोहजालभ्रम का जालमाया की वह शक्ति जो सत्य को छिपा देती है।
समावृता:पूरी तरह ढके हुएअज्ञान के आवरण से ढकी हुई आत्मा।
प्रसक्ता:अत्यधिक आसक्तइंद्रिय सुखों में डूब जाना।
कामभोगेषुभोग-विलास मेंक्षणिक सुखों की निरंतर खोज।
पतन्तिगिरते हैंचेतना के स्तर का नीचे गिरना।
नरकेनरक मेंअशांति, दुःख और अज्ञान का गर्त।
अशुचौअपवित्रविवेकहीनता और अधर्म का मार्ग।

इस श्लोक का गूढ़ भाव यह है कि जब मनुष्य का चित्त एक लक्ष्य पर केंद्रित न होकर अनेक इच्छाओं में बँट जाता है, तो वह अपनी आंतरिक शक्ति को खो देता है। मोह का जाल उसे यह विश्वास दिलाता है कि भोग ही सुख का साधन है, जबकि वास्तव में यही पतन का द्वार है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय का संदर्भ कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र से जुड़ा है, जहाँ अर्जुन अपने कर्तव्यों और मोह के बीच संघर्ष कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दैवी और आसुरी संपदा के बीच का अंतर समझाने हेतु इस अध्याय का उपदेश दिया। यह अध्याय विशेष रूप से 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' कहलाता है।

पौराणिक कथाओं में, हिरण्यकशिपु और रावण जैसे पात्रों को 'आसुरी' प्रवृत्तियों का प्रतीक माना गया है। वेदों और उपनिषदों में भी 'अविद्या' (अज्ञान) को ही समस्त दुखों का मूल कारण बताया गया है। जब हम पुराणों का अध्ययन करते हैं, तो पाते हैं कि असुरों की शक्ति अपार थी, किंतु उनका चित्त 'अनेकचित्तविभ्रान्ता' था। वे अपनी शक्तियों का उपयोग केवल भोग और अहंकार की तुष्टि के लिए करते थे।

महाभारत के प्रसंग में, दुर्योधन का चरित्र इस श्लोक का जीवंत उदाहरण है। वह मोहजाल में इतना फँसा था कि उसे पांडवों का धर्म और अपना अधर्म दिखाई नहीं दे रहा था। वह निरंतर 'कामभोगेषु' यानी राज्य और सुख के भोग में आसक्त था। अंततः, यही आसक्ति उसे और उसके पूरे वंश को विनाश के 'अशुचि नरक' में ले गई। यह श्लोक हमें सिखाता है कि इतिहास केवल राजाओं की कहानियाँ नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर चलने वाले युद्ध का प्रतिबिंब है। महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से हमें यह चेतावनी दी है कि यदि हम अपने मन को नियंत्रित नहीं करते, तो हम भी उसी मार्ग पर चल पड़ेंगे जिसका अंत केवल पतन है। यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें यह समझने में मदद करती है कि गीता का उपदेश केवल प्राचीन काल के लिए नहीं, बल्कि आधुनिक युग के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक एकाग्रता: इस श्लोक के निरंतर चिंतन से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • मोह का नाश: यह श्लोक माया के जाल को पहचानने और उससे मुक्त होने की शक्ति प्रदान करता है।
  • विवेक की जागृति: सत्य और असत्य के बीच भेद करने की क्षमता (विवेक) विकसित होती है।
  • अति-आसक्ति से मुक्ति: भौतिक भोगों के प्रति अत्यधिक लगाव कम होता है, जिससे मानसिक शांति मिलती है।
  • नकारात्मकता का अंत: मन में छिपे आसुरी विचारों और क्रोध का शमन होता है।
  • आत्म-नियंत्रण: इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है।
  • कर्म शुद्धि: व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति अधिक जागरूक और उत्तरदायी बनता है।
  • दैवीय कृपा: सात्विक जीवन जीने से ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय के १६वें श्लोक पर आधारित है। इसे गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और शंकराचार्य भाष्य के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। सामग्री का उद्देश्य पाठकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, बल्कि आत्म-सुधार और दार्शनिक चिंतन को प्रोत्साहित करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है वह मन जो एक साथ अनेक इच्छाओं और विचारों में भटक रहा है। जब मन स्थिर नहीं होता, तो वह सही निर्णय नहीं ले पाता।

भौतिक सुख प्राप्त करना पाप नहीं है, लेकिन उसमें 'आसक्त' (प्रसक्ता) हो जाना और उसे ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य मान लेना पतन का कारण बनता है।

नियमित सत्संग, स्वाध्याय, ध्यान और निष्काम कर्म के द्वारा मोहजाल से बाहर निकला जा सकता है।

नरक का अर्थ केवल मृत्यु के बाद का स्थान नहीं, बल्कि अज्ञानता, क्रोध, लोभ और अशांति से भरा जीवन भी नरक के समान है।

यह श्लोक हमें हर निर्णय लेने से पहले यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम मोह के वशीभूत होकर तो निर्णय नहीं ले रहे हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वे अनेक प्रकार की चित्तवृत्तियों से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, काम-भोगों में आसक्त होकर अपवित्र नरक में गिरते हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भोगासक्ति और मोह मनुष्य का पतन कर देते हैं। विवेक और वैराग्य से ही कल्याण संभव है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/24 67% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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