दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – श्लोक 15
श्लोक १५ में आसुरी व्यक्ति का अभिमान: मैं धनी, कुलीन, मेरे समान कोई नहीं; यज्ञ-दान करूँगा – यह अज्ञान है।
संस्कृत श्लोक
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||
āḍhyo 'bhijanavān asmi ko 'nyo 'sti sadṛśo mayā | yakṣye dāsyāmi modiṣya ity ajñāna-vimohitāḥ ||15||
पदच्छेद / शब्दार्थ
आढ्य: धनी; अभिजनवान्: कुलीन; अस्मि: हूँ; क: कौन; अन्य: अन्य; अस्ति: है; सदृश: समान; मया: मुझसे; यक्ष्ये: यज्ञ करूँगा; दास्यामि: दान दूँगा; मोदिष्ये: आनन्द मनाऊँगा; इति: इस प्रकार; अज्ञानविमोहिता: अज्ञान से मोहित।
हिंदी अनुवाद
मैं धनी और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
English Translation
I am rich and born in a noble family. Who is equal to me? I shall perform sacrifices, give charity and rejoice. Thus they are deluded by ignorance.
टीका / Commentary
आसुरी लोग धन और कुल के अभिमान में चूर रहते हैं। वे सोचते हैं कि उनके समान कोई नहीं। यज्ञ-दान भी अहंकार के लिए करते हैं। यह सब अज्ञान का परिणाम है।