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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 16 · श्लोक 15

अध्याय 16 · श्लोक 15

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||

āḍhyo 'bhijanavān asmi ko 'nyo 'sti sadṛśo mayā | yakṣye dāsyāmi modiṣya ity ajñāna-vimohitāḥ ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

आढ्य: धनी; अभिजनवान्: कुलीन; अस्मि: हूँ; क: कौन; अन्य: अन्य; अस्ति: है; सदृश: समान; मया: मुझसे; यक्ष्ये: यज्ञ करूँगा; दास्यामि: दान दूँगा; मोदिष्ये: आनन्द मनाऊँगा; इति: इस प्रकार; अज्ञानविमोहिता: अज्ञान से मोहित।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

मैं धनी और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

English Translation

I am rich and born in a noble family. Who is equal to me? I shall perform sacrifices, give charity and rejoice. Thus they are deluded by ignorance.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

आसुरी लोग धन और कुल के अभिमान में चूर रहते हैं। वे सोचते हैं कि उनके समान कोई नहीं। यज्ञ-दान भी अहंकार के लिए करते हैं। यह सब अज्ञान का परिणाम है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।