श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 16 (दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga))

अध्याय 16 · श्लोक 15

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 24 22 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
आढ्य
धनी
अभिजनवान्
कुलीन
अस्मि
हूँ
क
कौन
अन्य
अन्य
अस्ति
है
सदृश
समान
मया
मुझसे
यक्ष्ये
यज्ञ करूँगा
दास्यामि
दान दूँगा
मोदिष्ये
आनन्द मनाऊँगा
इति
इस प्रकार
अज्ञानविमोहिता
अज्ञान से मोहित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

मैं धनी और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने 'दैवी' और 'आसुरी' संपदाओं का विस्तृत वर्णन किया है। श्लोक १५, "आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया..." आसुरी वृत्ति वाले मनुष्यों की उस मानसिक अवस्था को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति स्वयं को ही सृष्टि का केंद्र मान बैठता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान का वह गहरा दर्पण है, जिसमें अहंकार की पराकाष्ठा दिखाई देती है। जब मनुष्य धन, कुल, और सत्ता के मद में अंधा हो जाता है, तो वह यह भूल जाता है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें 'अहंकार' के उस सूक्ष्म जाल से सावधान करता है जो व्यक्ति को धर्म के मार्ग से विचलित कर देता है। जब कोई व्यक्ति यह सोचता है कि "मेरे समान कोई नहीं है," तो वह अपनी प्रगति के द्वार स्वयं बंद कर लेता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि दान, यज्ञ और तप का फल तब तक शून्य है, जब तक उनमें 'अहं' का समावेश है। ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखने के लिए विनम्रता और कृतज्ञता अनिवार्य है। इस श्लोक का चिंतन हमें यह समझने में मदद करता है कि वास्तविक धन 'आध्यात्मिक संपदा' है, न कि भौतिक संचय। यह श्लोक अज्ञान के उस अंधकार को मिटाने का प्रयास करता है, जो मनुष्य को यह भ्रम देता है कि वह स्वयं ही अपना नियंता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया |
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर ध्यान देना आवश्यक है। 'आढ्यो' (Aadhyo) का अर्थ है धनवान, 'अभिजनवान' (Abhijanavan) का अर्थ है उच्च कुल में जन्मा। 'यक्ष्ये' (Yaksye) का अर्थ है यज्ञ करना। इस श्लोक को शांत चित्त से, अपनी आंतरिक वृत्तियों का अवलोकन करते हुए पढ़ना चाहिए। यह श्लोक हमें आत्म-निरीक्षण (Self-Introspection) की प्रेरणा देता है। इसका पाठ करते समय यह भाव रखें कि हम अपने भीतर के 'असुर' को पहचानकर उसे 'दैवी' गुणों में परिवर्तित करने का संकल्प ले रहे हैं। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि अज्ञान के आवरण को हटाने की एक मानसिक प्रक्रिया है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आढ्य:धनवानभौतिक संपत्ति का अहंकार जो आत्मा को ढक लेता है।
अभिजनवानउच्च कुल वालावंश परंपरा का गर्व, जो अहंकार का एक सूक्ष्म रूप है।
अस्मिमैं हूँअहंकार का मूल केंद्र, 'मैं' की भावना।
कोऽन्य:दूसरा कौनअहंकार के कारण उत्पन्न श्रेष्ठता का भ्रम।
सदृश:समानतुलनात्मक दृष्टि, जो ईर्ष्या और द्वेष को जन्म देती है।
यक्ष्येयज्ञ करूँगादिखावे के लिए किए गए धार्मिक अनुष्ठान।
दास्यामिदान दूँगाअहंकार की तुष्टि के लिए किया गया दान।
मोदिष्यआनंद मनाऊँगाइंद्रिय सुख में ही परम सुख की खोज।
अज्ञानविमोहिता:अज्ञान से मोहितमाया के वशीभूत होकर सत्य को न देख पाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के १६वें अध्याय को 'दैवासुरसंपद्विभागयोग' कहा जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि संसार में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं। यह श्लोक विशेष रूप से हिरण्यकश्यप, रावण और दुर्योधन जैसे उन पात्रों की मानसिकता को दर्शाता है, जिन्होंने अपनी शक्ति और कुल के मद में ईश्वर की सत्ता को चुनौती दी थी।

पौराणिक संदर्भ में, हिरण्यकश्यप का उदाहरण सबसे सटीक है। उसने तपस्या की, शक्ति अर्जित की, और अंततः यह मान लिया कि वह स्वयं ही भगवान है। वह यज्ञ भी करता था, लेकिन उसका उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वयं को सिद्ध करना था। इसी प्रकार, रावण ने अपनी विद्या और कुल के अहंकार में यह भूल कर दिया कि धर्म के बिना शक्ति विनाश का कारण बनती है। महाभारत के संदर्भ में, दुर्योधन का चरित्र भी इसी श्लोक का जीवंत उदाहरण है। उसने अपनी धन-संपदा और अपने कुल (कौरव वंश) के अभिमान में धर्मराज युधिष्ठिर की उपेक्षा की।

शास्त्रों के अनुसार, जब मनुष्य के भीतर 'मैं' (अहंकार) का उदय होता है, तो वह 'अज्ञानविमोहित' हो जाता है। यह अज्ञान उसे यह नहीं देखने देता कि जो धन और कुल उसे प्राप्त है, वह ईश्वरीय कृपा का फल है, न कि उसकी स्वयं की उपलब्धि। यह श्लोक हमें वेदों के उस सार की ओर ले जाता है जहाँ कहा गया है—"ईशावास्यमिदं सर्वम्" (सब कुछ ईश्वर का है)। जब हम इस सत्य को भूल जाते हैं, तो हम आसुरी मार्ग पर अग्रसर हो जाते हैं। अतः, यह श्लोक केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका है जो हमें अहंकार के दलदल से बाहर निकलने का मार्ग दिखाती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का शमन: इस श्लोक का नियमित चिंतन मनुष्य के भीतर दबे अहंकार को धीरे-धीरे समाप्त करता है।
  • मानसिक स्पष्टता: यह अज्ञान के पर्दों को हटाकर सत्य और असत्य के बीच भेद करने की बुद्धि प्रदान करता है।
  • विनम्रता का विकास: यह हमें सिखाता है कि हम जो कुछ भी हैं, वह ईश्वर की कृपा है, जिससे स्वभाव में विनम्रता आती है।
  • कर्म की शुद्धि: जब हम यह जान लेते हैं कि दान और यज्ञ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि सेवा के लिए हैं, तो हमारे कर्म शुद्ध हो जाते हैं।
  • तुलनात्मक सोच से मुक्ति: "मेरे समान कोई नहीं" की भावना से मुक्त होकर व्यक्ति दूसरों का सम्मान करना सीखता है।
  • आध्यात्मिक शांति: मोह और माया के बंधनों से मुक्ति मिलने पर मन को अपार शांति का अनुभव होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): अहंकार रहित व्यक्ति के चारों ओर एक सकारात्मक और शांत ऊर्जा का संचार होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: विनम्र और अहंकारहीन भक्त पर भगवान की कृपा सहज ही बरसती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों और भाष्यकारों के सिद्धांतों के आधार पर संकलित किया गया है। इसमें प्रयुक्त अर्थ और व्याख्याएं आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और अन्य वैदिक विद्वानों के दृष्टिकोण से प्रेरित हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत और तार्किक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-सुधार और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

धनवान होना पाप नहीं है, लेकिन धन का अहंकार करना पाप है। यदि धन का उपयोग सेवा और धर्म के लिए किया जाए, तो वह वरदान है।

आसुरी वृत्ति वह है जो केवल स्वयं के सुख, अहंकार और भौतिकता को महत्व देती है और धर्म व नैतिकता को नकारती है।

यज्ञ और दान का उद्देश्य ईश्वर की प्रसन्नता और लोक कल्याण होना चाहिए, न कि अपनी प्रशंसा या अहंकार की तुष्टि।

इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो माया के प्रभाव में आकर सत्य को नहीं देख पाता और स्वयं को ही सब कुछ मान बैठता है।

हम यह सीख सकते हैं कि सफलता के शिखर पर पहुँचकर भी विनम्र रहना चाहिए और अपनी उपलब्धियों का श्रेय ईश्वर को देना चाहिए।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

आसुरी व्यक्ति सोचता है: "मैं धनी हूँ, कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा" – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

धन और कुल का अभिमान मनुष्य को विनाश की ओर ले जाता है। विनम्रता और सेवा भाव ही श्रेष्ठ हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 16: दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/24 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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